रेखाओं के मनोविज्ञान में खोई हुई स्त्री
उस रात के बाद
वह स्केचबुक मेरे भीतर खुली
ही रह गई थी।
बंद करने पर भी
बंद नहीं होती थी।
कभी-कभी मुझे लगता
कि उसके पन्ने अब
काग़ज़ नहीं रहे,
वे किसी स्त्री के
भीतर की परतें बन
गए हैं—
जहाँ हर रेखा एक
स्मृति है,
और हर स्मृति एक
अधूरा चेहरा।
मैं
फिर उसके घर नहीं
गया था।
पर वह स्त्री मेरे
भीतर आने लगी थी—
धीरे-धीरे, बिना अनुमति के।
जैसे
कोई चित्र दीवार से उतरकर
मन में रहने लगे।
कुछ
दिनों बाद एक शाम
उसने स्वयं फोन किया।
“आप
बहुत दिनों से नहीं आए,”
उसने कहा।
उसकी
आवाज़ में शिकायत नहीं
थी।
बस एक रिक्तता थी,
जिसे कोई नाम नहीं
दिया गया था।
मैं
कुछ क्षण चुप रहा।
“क्या
मैं आऊँ?” मैंने पूछा।
वह थोड़ी देर रुकी।
“आ जाइए,” उसने कहा, “लेकिन
आज घर पहले जैसा
नहीं लगेगा।”
जब मैं पहुँचा, तो
दरवाज़ा पहले से थोड़ा
खुला हुआ था।
जैसे वह मुझे भीतर
बुला नहीं रही हो,
बल्कि भीतर से बाहर
आ रही हो।
घर में प्रवेश करते
ही मुझे पहला परिवर्तन
दिखा।
दीवारें।
पहले
जहाँ हल्का धूसर रंग था,
वहाँ अब सफेद परत
चढ़ी थी।
पर वह सफेदी शांत
नहीं थी—
उसमें किसी तरह की
बेचैनी थी,
जैसे किसी ने पुरानी
रेखाओं को मिटाने की
कोशिश की हो,
पर वे पूरी तरह
गई न हों।
गोल
मेज़ अब भी थी,
पर उसके ऊपर एक
पतली सीधी काली रेखा
खिंची हुई थी—
ठीक बीचोंबीच।
मैंने
उसकी ओर देखा।
वह वहीं खड़ी थी।
पर आज वह पहले
जैसी नहीं थी।
उसकी
नाक अब भी वही
छोटी और खड़ी रेखा
थी,
भौंहें अब भी अधूरी
वक्रता में थीं,
पर उसके चेहरे पर
कुछ टूट चुका था—
या शायद कुछ हट
गया था।
जैसे
कोई अपने ही भीतर
से बाहर निकल आया
हो।
“तुमने
घर बदल दिया?” मैंने
पूछा।
वह हल्का-सा मुस्कुराई।
“नहीं,”
उसने कहा, “मैंने बस रेखाएँ बदल
दी हैं।”
मैं
बैठ गया।
इस बार वह चाय
बनाने नहीं गई।
सीधे सामने बैठ गई।
उसकी
आँखें अब भी लोगों
को देखती थीं,
पर आज उनमें वह
पुरानी तौल नहीं थी।
आज उनमें खालीपन था।
और यह खालीपन डरावना
था।
“आप
जानते हैं,” उसने धीरे से
कहा,
“मैं बहुत दिनों से
कोशिश कर रही थी
कि मैं लोगों को
न देखूँ।”
मैंने
उसकी तरफ देखा।
“क्यों?”
मैंने पूछा।
वह खिड़की की ओर देखने
लगी।
“क्योंकि
जब मैं देखती हूँ,”
उसने कहा,
“तो रेखाएँ अपने आप बन
जाती हैं।”
उसने
अपनी हथेली उठाई।
“और
फिर मैं समझ नहीं
पाती कि ये मेरी
हैं या दूसरों की।”
कमरे
में एक लंबा मौन
फैल गया।
इस बार मौन में
कोई वस्तु नहीं थी।
न कोई घड़ी, न
कोई टिक-टिक,
न कोई हल्की हवा।
बस एक स्थिरता थी—
जैसे सब कुछ रुक
गया हो,
पर भीतर कुछ चल
रहा हो।
वह उठी और उस
कोने की ओर गई
जहाँ उसकी स्केचबुक रखी
रहती थी।
पर वहाँ अब स्केचबुक
नहीं थी।
सिर्फ
खाली जगह थी।
“मैंने
सब जला दिया,” उसने
कहा।
मैं
चौंका नहीं।
शायद किसी स्तर पर
मैं पहले से जानता
था।
“क्यों?”
मैंने पूछा।
वह कुछ देर चुप
रही।
फिर
बोली—
“क्योंकि
हर चेहरा जो मैं बनाती
थी,
वह अंत में मेरा
ही बन जाता था।”
उस रात जब मैं
वहाँ से निकला,
तो सीढ़ियाँ पहले जैसी नहीं
थीं।
हर सीढ़ी पर एक हल्की
रेखा थी—
कभी सीधी, कभी टूटी, कभी
गोल।
और मुझे पहली बार
लगा कि
मैं जिस स्त्री से
मिला था,
वह अब किसी घर
में नहीं रहती।
वह अब केवल रेखाओं
में रहती है।
और रेखाएँ—
कभी खत्म नहीं होतीं।
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