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Tuesday, 26 May 2026

उसके चेहरे की ज्यामिति

 

                                                           उस दिन

के बाद उसके घर जाना धीरे-धीरे एक आदत नहीं रहा, बल्कि एक तरह की अनिवार्यता बन गया था। मैं स्वयं भी यह ठीक-ठीक नहीं समझ पाता था कि मैं वहाँ क्यों जाता हूँउससे मिलने, या उसके भीतर छिपी किसी अनकही संरचना को देखने।

कई बार ऐसा लगता कि वह स्त्री स्वयं किसी निश्चित रूप में जी ही नहीं रही, बल्कि लगातारबनरही हैजैसे रेखाएँ काग़ज़ पर बनते-बनते अपना अर्थ खोजती हैं।

उसके घर की वस्तुओं में अब मुझे कोई आकस्मिकता नहीं दिखती थी। हर चीज़ जैसे किसी विचार का भौतिक रूप हो। गोल मेज़ केवल गोल नहीं थीवह किसी स्मृति का पूरा चक्र थी, जो अपने भीतर से बाहर नहीं निकलना चाहती थी। और वे त्रिकोणीय किनारों वाली अलमारियाँवे किसी अनकहे निर्णय की तरह कमरे में खड़ी रहती थीं।

उस दिन उसने मुझे देर से दरवाज़ा खोला।

उसके चेहरे पर वही पुरानी थकान थी, पर उसमें एक नई परत जुड़ गई थीजैसे किसी ने भीतर कुछ पढ़ना शुरू कर दिया हो और अब उसे बंद करना कठिन हो गया हो।

आज आप थोड़े देर से आए,” उसने कहा।

उसकी आवाज़ में शिकायत नहीं थी, केवल एक निरीक्षण था।

मैं भीतर आकर बैठ गया।
कमरा पहले से अधिक शांत था। यहाँ तक कि घड़ी की टिक-टिक भी जैसे स्वयं से शर्मिंदा हो।

उसने चाय नहीं बनाई। बस सामने बैठ गई।

कुछ क्षण हम दोनों के बीच केवल मौन था।

फिर उसने अचानक पूछा

आप लोगों को देखते समय क्या सोचते हैं?”

यह प्रश्न साधारण नहीं था। इसमें कोई प्रवेश-द्वार नहीं था, केवल सीधा गहरा कुआँ था।

मैंने कहा, “शायद कुछ नहींया बहुत कुछ, पर अस्पष्ट।

वह हल्का-सा हँसी।

अस्पष्टता अच्छी चीज़ है,” उसने कहा, “जो लोग साफ़ देख लेते हैं, वे जल्दी छोड़ भी देते हैं।

उसने अपनी उँगलियाँ मेज़ पर रखीं।
वे उँगलियाँ स्थिर नहीं थीं। उनमें हल्का-सा कंपन थाजैसे भीतर कोई विचार लगातार चल रहा हो, पर शब्द तक नहीं पहुँच पा रहा हो।

तभी पहली बार मैंने देखा कि उसके नाखूनों का आकार भी अलग थापूरी तरह गोल नहीं, पूरी तरह नुकीले भी नहीं। जैसे वह हर चीज़ मेंबीचमें रहती हो।

मैंने पूछा, “तुम हमेशा लोगों को पढ़ती रहती हो?”

उसने मेरी तरफ देखा। इस बार उसकी दृष्टि थोड़ी देर तक रुकी रही।

पढ़ती नहीं हूँ,” उसने कहा, “बस उनके अंदर की रेखाएँ देखती हूँ।

यह वाक्य कहकर वह चुप हो गई।

मुझे लगा जैसे कमरे की हवा थोड़ा भारी हो गई है।

कुछ देर बाद वह उठी और अलमारी की तरफ गई। वहाँ से उसने एक पुरानी स्केचबुक निकाली।

इसे देखोगे?”

उसने स्केचबुक मेरे सामने रख दी।

मैंने जैसे ही पहला पन्ना खोला, मुझे लगा कि मैं किसी चित्र नहीं, किसी मनःस्थिति में प्रवेश कर रहा हूँ।

वहाँ चेहरे थेपर अधूरे।
कुछ में केवल आँखें थीं, कुछ में केवल नाक।
कुछ रेखाएँ इतनी महीन थीं कि वे हवा में घुलती प्रतीत होती थीं।

कहीं-कहीं रेखाएँ अचानक टूट जाती थीं, जैसे कलाकार ने बीच में ही हाथ रोक लिया होया जैसे विचार ने स्वयं को आगे जाने से मना कर दिया हो।

ये तुम बनाती हो?” मैंने धीरे से पूछा।

वह कुछ क्षण चुप रही।

मैं नहीं जानती,” उसने कहा, “कभी-कभी लगता है ये मैं नहीं बनातीये अपने आप बन जाते हैं।

उसकी आवाज़ में अब कोई आत्मविश्वास नहीं था।
केवल एक स्वीकार था।

स्केचबुक के अंतिम पन्ने पर एक ही चेहरा था।
पूरा नहीं।
पर सबसे अधिक जीवित।

उसकी भौंहें वही अधूरी अर्धवृत्त थीं।
नाक वही छोटा कठोर कोण।
और ठुड्डी वही हल्का झुकाव।

मैंने धीरे से कहा, “यह तुम हो?”

उसने कोई उत्तर नहीं दिया।

उसने बस खिड़की की तरफ देखा।

बाहर हल्की रोशनी थी।
और उस रोशनी में उसकी परछाईं दीवार पर पड़ रही थी
थोड़ी टेढ़ी, थोड़ी टूटी हुई।

अगर मैं खुद को पूरी तरह देख लूँ,” उसने बहुत धीमे स्वर में कहा, “तो शायद मैं खुद को पहचानना बंद कर दूँ।

उस वाक्य के बाद कमरे में फिर मौन लौट आया।

पर अब यह वही मौन नहीं था जो पहले था।
यह अधिक गहरा थाजैसे किसी रेखा के अंत में लगा वह बिंदु, जहाँ से आगे कुछ नहीं होता, पर वह बिंदु भी अधूरा रहता है।

मैंने स्केचबुक बंद कर दी।

और उस क्षण मुझे पहली बार समझ में आया

वह स्त्री लोगों को नहीं पढ़ती थी।
वह स्वयं को देखने की कोशिश में दूसरों को एक माध्यम बना देती थी।

जैसे कोई चित्रकार अपने ही चेहरे को सीधे नहीं देख पाता, इसलिए वह हर वस्तु में अपनी रेखाएँ खोजता रहता है।

उस शाम जब मैं वहाँ से निकला,
सीढ़ियाँ पहले से अधिक लंबी लग रही थीं।

और हर सीढ़ी पर
मुझे लगता रहा कि कोई अदृश्य रेखा मेरे साथ उतर रही है
धीरे, चुपचाप,
और लगातार बदलती हुई।

 

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