“यह उस मनुष्य का रोज़नामचा है जो समय की दौड़ से थोड़ा बाहर खड़ा है और साधारण दिनों में असाधारण अर्थ खोजता है।”
धूल और उखड़ी हुई सीढ़ियाँ
पुरानी इमारत की
सीढ़ियाँ
बीच-बीच से उखड़ गई थीं।
उन पर
धूल की एक परत थी
जिसमें
सिर्फ़ ऊपर जाने वाले
क़दमों के निशान थे।
मुकेश ,,,
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