“यह उस मनुष्य का रोज़नामचा है जो समय की दौड़ से थोड़ा बाहर खड़ा है और साधारण दिनों में असाधारण अर्थ खोजता है।”
छत पर पतंग
शाम ढलने के बाद भी
एक पतंग
छत के ऊपर
अटकी रही।
डोर
किसी और मकान में
गिर चुकी थी।
मुकेश ,,,,,,,,,,,
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