रात अब पूरी तरह उतर आई थी।
सामने की सड़क पर गाड़ियों की आवाजाही कम हो गई थी।
दूर कहीं किसी कुत्ते के भौंकने की आवाज़ आती, फिर बहुत देर तक कुछ नहीं सुनाई देता।
उस “कुछ नहीं” में ही शहर का असली चेहरा रहता है —
दिन की भीड़ से अलग, बिना मुखौटे का, थोड़ा थका हुआ, थोड़ा अकेला।
वह अब भी उसी तरह बैठा था।
खिड़की के शीशे में उसका धुँधला प्रतिबिंब दिखाई दे रहा था।
उसे हमेशा यह अजीब लगता था कि रात में खिड़कियाँ बाहर से ज़्यादा भीतर दिखाने लगती हैं।
दिन में आदमी दुनिया देखता है।
रात में वही शीशा उसे उसका अपना चेहरा लौटा देता है।
उसने ध्यान से अपने प्रतिबिंब को देखा।
बालों की सफ़ेदी अब कनपटियों से आगे बढ़ चुकी थी।
आँखों के नीचे हल्की सूजन थी।
चेहरे पर वह थकान नहीं थी जो मेहनत से आती है —
वह दूसरी तरह की थकान थी, जो बहुत वर्षों तक जीवन को भीतर चुपचाप ढोने से आती है।
उसे अचानक याद आया —
एक समय था जब उसे अपने चेहरे से मोह था।
कॉलेज के दिनों में वह शीशे के सामने खड़े होकर बाल सँवारा करता।
नई कमीज़ पहनते हुए उसे लगता, दुनिया अभी शुरू हुई है और उसमें उसके लिए बहुत जगह बची हुई है।
अब उसे अपने चेहरे से कोई शिकायत भी नहीं थी, कोई लगाव भी नहीं।
उम्र का एक पड़ाव ऐसा आता है जहाँ आदमी अपने चेहरे को ऐसे देखने लगता है, जैसे किसी पुराने किरायेदार को देख रहा हो —
बहुत साल साथ रहे, मगर अब बातचीत कम रह गई हो।
कमरे में रखे पुराने रेडियो से हल्की खरखराहट उठी।
शायद स्टेशन ठीक से नहीं पकड़ रहा था।
फिर अचानक एक पुराना गीत उभरा —
“वक़्त ने किया क्या हसीं सितम…”
वह मुस्कराया नहीं।
बस उसकी उँगलियाँ मग पर थोड़ी कस गईं।
कुछ गाने संगीत नहीं होते।
वे बंद कमरों के दरवाज़े होते हैं।
और हर आदमी के भीतर कुछ कमरे ऐसे होते हैं, जिन्हें वह जान-बूझकर बंद रखता है।
लेकिन स्मृति बड़ी धैर्यवान चीज़ है।
वह दरवाज़ा नहीं तोड़ती।
बस वर्षों तक धीरे-धीरे दस्तक देती रहती है।
उसे वह शाम याद आई जब उसने पहली बार अपनी पत्नी का हाथ पकड़ा था।
कोई फ़िल्मी दृश्य नहीं था।
न बारिश, न संगीत।
बस स्टेशन का प्लेटफ़ॉर्म था।
भीड़ बहुत थी।
ट्रेन छूटने वाली थी।
और भीड़ में बिछड़ न जाए, इसलिए उसने उसका हाथ पकड़ लिया था।
लेकिन उस क्षण उसे पहली बार महसूस हुआ था कि किसी दूसरे मनुष्य का हाथ पकड़ना सिर्फ़ स्पर्श नहीं होता —
वह अपने अकेलेपन का थोड़ा हिस्सा किसी और को सौंप देना भी होता है।
उसने आँखें बंद कर लीं।
उसे अब उसकी उँगलियों की बनावट तक याद नहीं थी।
सिर्फ़ एक एहसास बचा था।
जैसे बहुत पुरानी बारिश की नमी दीवारों में रह जाती है, जबकि पानी कब का सूख चुका होता है।
बाहर से एक मोटरसाइकिल तेज़ आवाज़ में गुज़री।
वह हल्का-सा चौंका।
उसे महसूस हुआ कि वह अब छोटी आवाज़ों से भी चौंकने लगा है।
शायद इसलिए कि अकेले रहने वाले लोग धीरे-धीरे आवाज़ों के प्रति ज़्यादा संवेदनशील हो जाते हैं।
उनके भीतर चुप्पी का क्षेत्र बड़ा होता जाता है।
उसने कमरे पर नज़र डाली।
किताबें।
पुराना सोफ़ा।
दीवार पर टँगी तस्वीरें।
लकड़ी की अलमारी, जिसके निचले हिस्से का रंग नमी से उखड़ने लगा था।
सब कुछ वैसा ही था।
और फिर भी, सब बदल चुका था।
उसे अचानक लगा कि घर कभी स्थिर नहीं रहते।
वे भी हमारे साथ बूढ़े होते हैं।
दीवारें हमारी आदतें सीख लेती हैं।
फ़र्श हमारे चलने की दिशा याद रखता है।
कुर्सियाँ जानती हैं कि हम सबसे ज़्यादा थककर कहाँ बैठते हैं।
और फिर एक दिन वही घर हमें ऐसे देखने लगता है, जैसे वह हमसे ज़्यादा समय का साक्षी हो।
उसने कॉफ़ी का आख़िरी घूँट लिया।
ठंडी, लगभग बेस्वाद।
लेकिन उसने मग नीचे नहीं रखा।
उसकी आँखें अब फिर बाहर थीं।
सड़क लगभग खाली हो चुकी थी।
नीम का पेड़ अँधेरे में सिर्फ़ एक काला आकार रह गया था।
और तभी उसे बहुत भीतर कहीं एक अजीब-सी बात महसूस हुई —
शायद जीवन में सबसे गहरी त्रासदी मृत्यु नहीं होती।
त्रासदी यह होती है कि मनुष्य धीरे-धीरे उन चीज़ों का आदी हो जाता है, जो एक दिन उससे छिन जाने वाली हैं।
प्रेम।
साथ।
आवाज़ें।
रात के खाने पर किसी का इंतज़ार।
खिड़की के पास रखी दूसरी कुर्सी।
उसने धीमे से सिर पीछे टिकाया।
घड़ी अब भी चल रही थी।
समय हमेशा चलता रहता है।
चाहे किसी के जीवन में कुछ बचा हो या नहीं।
कमरे की रोशनी बहुत मुलायम हो गई थी।
उसके चेहरे पर आधा उजाला था, आधा अँधेरा।
और उसी अधूरे प्रकाश में वह आदमी बैठा रहा
कॉफ़ी का खाली मग हाथ में लिए,
जैसे कोई व्यक्ति नहीं,
बल्कि अपनी ही बीती हुई उम्र का अंतिम पहरेदार हो।
मुकेश ,,,,,,,,,
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