उस शाम कमरे में एक ऐसी ख़ामोशी थी, जो किसी अनुपस्थित व्यक्ति की तरह मौजूद रहती है।
न बोलती है, न हटती है — बस धीरे-धीरे हर चीज़ पर अपनी महीन धूल बिछाती रहती है।
वह आदमी खिड़की के पास बैठा था।
पचपन या छप्पन की उम्र होगी।
उस उम्र का चेहरा, जिसमें आदमी बूढ़ा कम और अपने ही भीतर ज़्यादा रहने लगता है।
उसके हाथ में कॉफ़ी का मग था।
कॉफ़ी अब गुनगुनी भी नहीं रही थी, लेकिन वह उसे वैसे ही पकड़े हुए था, जैसे लोग कभी-कभी किसी पुरानी चिट्ठी को पकड़े रहते हैं — पढ़ते नहीं, सिर्फ़ पकड़े रहते हैं।
कमरे में हल्की पीली रोशनी थी।
दीवार के कोने पर लगी घड़ी बहुत धीमी आवाज़ में चल रही थी।
इतनी धीमी कि उसकी टिक-टिक सुनने के लिए भीतर का शोर कम करना पड़ता।
खिड़की के बाहर वही सड़क थी, जिस पर वह पिछले बाईस वर्षों से शाम उतरते देखता आया था।
उसी मोड़ पर पान वाला।
उसी बिजली के खंभे पर झुका तार।
उसी अधबने मकान की छत पर बैठे कबूतर।
और वही नीम का पेड़, जिसकी एक शाख़ कुछ महीने पहले आँधी में टूट गई थी।
उसे उस टूटी शाख़ का दुख अजीब तरह से याद था।
लोग सोचते हैं, आदमी बड़े दुखों से टूटता है।
लेकिन सच यह है कि मनुष्य अक्सर उन चीज़ों से टूटता है, जिन्हें कोई घटना भी नहीं मानता।
जैसे एक दिन अचानक यह महसूस होना कि अब घर में किसी के चप्पलों की आवाज़ नहीं आती।
उसने धीरे से मग होंठों तक उठाया।
कॉफ़ी में अब कड़वाहट ज़्यादा थी।
उसे याद आया — कभी इसी कमरे में चाय की भाप और बातचीत साथ-साथ उठते थे।
उसकी पत्नी को कॉफ़ी पसंद नहीं थी।
वह हमेशा इलायची वाली चाय बनाती।
और हर बार कप रखते हुए पूछती —
“इतनी खिड़की के बाहर क्या देखते रहते हो?”
वह कभी जवाब नहीं दे पाता था।
शायद इसलिए कि आदमी जिन चीज़ों को सबसे ज़्यादा देखता है, उन्हें कभी ठीक से समझा नहीं पाता।
पत्नी को गए सात साल हो चुके थे।
“गए” — उसने मन ही मन यह शब्द दोहराया और उसे लगा, मृत्यु के लिए भाषा ने कितना मुलायम शब्द चुना है।
जैसे कोई सिर्फ़ दूसरे कमरे में गया हो और अभी लौट आएगा।
लेकिन कुछ लोग लौटते नहीं।
सिर्फ़ उनकी आदतें लौटती हैं।
सुबह अलमारी खोलते समय।
बरसात की पहली गंध में।
किसी पुराने गाने की दो पंक्तियों में।
या रात के उस हिस्से में, जहाँ नींद और स्मृति एक-दूसरे में घुलने लगते हैं।
उसने सामने रखी मेज़ को देखा।
मेज़ पर अब भी एक हल्का गोल निशान था —
वहीं, जहाँ उसकी पत्नी अपना कप रखा करती थी।
सात वर्षों में उसने वह मेज़ नहीं बदली।
कभी-कभी उसे लगता था, मनुष्य प्रेम में नहीं रहता —
वह वस्तुओं में बस जाता है।
एक पुराना तकिया।
एक कंघी।
अधूरी पढ़ी किताब में रखा सूखा पत्ता।
दरवाज़े की कुंडी बंद करने का वही ढंग।
और फिर एक दिन वे चीज़ें अपनी जगह पर रहती हैं, लेकिन जिनके कारण उनमें अर्थ था, वे नहीं रहते।
तब कमरा धीरे-धीरे कमरा नहीं रह जाता।
वह स्मृतियों का संग्रहालय बन जाता है।
बाहर सड़क पर अज़ान की आवाज़ तैरती हुई आई।
उस आवाज़ में हमेशा उसे एक अजीब उदासी लगती थी —
जैसे कोई बहुत दूर से किसी को पुकार रहा हो।
उसने खिड़की से बाहर देखा।
एक लड़का साइकिल पर गुज़र रहा था।
पीछे उसकी बेटी बैठी थी, दोनों हँस रहे थे।
उस क्षण उसे अपनी बेटी याद आई —
छोटी थी तब इसी खिड़की पर चढ़कर बारिश देखा करती थी।
अब कनाडा में रहती थी।
फोन पर बात होती थी, मगर बातचीतों में अब वह घरेलू बेतकल्लुफ़ी नहीं बची थी, जिसमें लोग बिना वजह भी चुप रह सकते हैं।
अब हर बातचीत में सूचना ज़्यादा होती थी, अपनापन कम।
“पापा, दवा टाइम से ले रहे हैं न?”
“हाँ।”
“ठंड बहुत है वहाँ?”
“ठीक है।”
फिर दोनों कुछ सेकंड चुप रहते।
और वही चुप्पी सबसे सच्ची बात होती।
उसने महसूस किया कि उम्र दरअसल शरीर की नहीं, अनुपस्थितियों की गिनती है।
जितने लोग भीतर से कम होते जाते हैं, आदमी उतना बूढ़ा होता जाता है।
कमरे में हल्की ठंड बढ़ रही थी।
उसने शॉल अपने कंधे पर ठीक की।
टेबल पर रखी किताब खुली हुई थी, मगर वह कई मिनटों से एक ही पंक्ति पर अटका था।
उसे अचानक लगा —
जीवन शायद किसी बड़े अर्थ की तरफ़ नहीं जाता।
हम बस धीरे-धीरे अपनी आदतों के भीतर बैठते जाते हैं।
और फिर एक दिन समय आकर उन आदतों को हमसे अलग कर देता है।
पहले लोग छूटते हैं।
फिर रास्ते।
फिर शहर।
फिर इच्छाएँ।
अंत में आदमी सिर्फ़ एक खिड़की बच जाता है,
जिससे वह दुनिया को नहीं, अपने बीते हुए समय को देखता रहता है।
बाहर रात थोड़ी और गहरी हो गई थी।
सड़क की बत्तियाँ जल चुकी थीं।
उनकी पीली रोशनी में हवा में उड़ती धूल ऐसे दिख रही थी, जैसे समय स्वयं छोटे-छोटे कणों में टूटकर तैर रहा हो।
उसने मग को दोनों हाथों से थाम लिया।
कॉफ़ी अब बिल्कुल ठंडी हो चुकी थी।
लेकिन वह फिर भी उसी तरह बैठा रहा
खिड़की के पास,
धीरे-धीरे अँधेरे में डूबते कमरे में,
जैसे कोई आदमी नहीं,
अपनी ही स्मृतियों का अंतिम दर्शक बैठा हो।
मुकेश ,,,,,,,,
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