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Saturday, 9 May 2026

धूप भीतर तलक उतरती है,

 धूप भीतर तलक उतरती है,

तेरी यादों की बर्फ़ पिघलती है।


रात ख़ामोश जब भी होती है,

दिल में इक चाँदनी-सी जलती है।


तेरे लहजे की नर्म बारिश से,

रूह तक आज भी बहलती है।


तेरी आँखों का ख़्वाब क्या कहिए,

नींद पलकों पे आ मचलती है।


मैंने चाहा था भूल जाऊँ तुझे,

पर तेरी बात फिर निकलती है।


दर्द सीने में जब उभरता है,

कोई तस्वीर-सी बदलती है।


वक़्त के साथ जिस्म ढलता है,

रूह लेकिन कहाँ सँभलती है।


तेरी ख़ुशबू है मेरे कमरे में,

शाम चुपके से आ टहलती है।


इश्क़ दरिया है आग का ‘मुकेश’,

रूह इसमें उतर के जलती है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,

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