धूप भीतर तलक उतरती है,
तेरी यादों की बर्फ़ पिघलती है।
रात ख़ामोश जब भी होती है,
दिल में इक चाँदनी-सी जलती है।
तेरे लहजे की नर्म बारिश से,
रूह तक आज भी बहलती है।
तेरी आँखों का ख़्वाब क्या कहिए,
नींद पलकों पे आ मचलती है।
मैंने चाहा था भूल जाऊँ तुझे,
पर तेरी बात फिर निकलती है।
दर्द सीने में जब उभरता है,
कोई तस्वीर-सी बदलती है।
वक़्त के साथ जिस्म ढलता है,
रूह लेकिन कहाँ सँभलती है।
तेरी ख़ुशबू है मेरे कमरे में,
शाम चुपके से आ टहलती है।
इश्क़ दरिया है आग का ‘मुकेश’,
रूह इसमें उतर के जलती है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,
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