अब किसी मोड़ पर ठहराव नहीं
ज़िंदगी में कोई पड़ाव नहीं
धूप भीतर तलक उतरती है,
सिर्फ़ चेहरों पे अब नक़ाब नहीं
मैंने सच बोलकर ये जाना है,
झूठ वालों में इज़्तिराब नहीं
शहर भर में बहुत उजाले हैं,
फिर भी लोगों में आफ़्ताब नहीं
दिल की वीरान मस्जिदों में अब,
कोई सज्दा है, कोई ख़्वाब नहीं
जिसको चाहा था उम्र भर मैंने,
वो मिरे नाम की किताब नहीं
मैंने तन्हाई से किया रिश्ता,
अब किसी शोर का दबाव नहीं
रूह थकती नहीं सफ़र करते,
जिस्म को बस मगर शबाब नहीं
वक़्त हर चीज़ छीन लेता है,
इश्क़ लेकिन कोई सराब नहीं
'मुकेश' अपने ही दर्द का दरिया हूँ,
मुझमें डूबे कोई हुबाब नहीं।
मुकेश ,,,,,,,,,,,
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