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Saturday, 9 May 2026

अब किसी मोड़ पर ठहराव नहीं

 अब किसी मोड़ पर ठहराव नहीं

ज़िंदगी में कोई पड़ाव नहीं


धूप भीतर तलक उतरती है,

सिर्फ़ चेहरों पे अब नक़ाब नहीं


मैंने सच बोलकर ये जाना है,

झूठ वालों में इज़्तिराब नहीं


शहर भर में बहुत उजाले हैं,

फिर भी लोगों में आफ़्ताब नहीं


दिल की वीरान मस्जिदों में अब,

कोई सज्दा है, कोई ख़्वाब नहीं


जिसको चाहा था उम्र भर मैंने,

वो मिरे नाम की किताब नहीं


मैंने तन्हाई से किया रिश्ता,

अब किसी शोर का दबाव नहीं


रूह थकती नहीं सफ़र करते,

जिस्म को बस मगर शबाब नहीं


वक़्त हर चीज़ छीन लेता है,

इश्क़ लेकिन कोई सराब नहीं


'मुकेश' अपने ही दर्द का दरिया हूँ,

मुझमें डूबे कोई हुबाब नहीं।


मुकेश ,,,,,,,,,,,

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