आत्मैकत्व और सृष्टि-संकल्प : ऐतरेयोपनिषद् का अद्वैत उद्घोष
मन्त्र (संस्कृत मूलपाठ)
आत्मा
वा इदमेक एवाग्र आसीत्। नान्यत्किञ्चन मिषत्। स ईक्षत — लोकान्नु सृजा इति॥
पाठभेद
कुछ
पाठों में “मिषत्” के
स्थान पर “मिषत्” अथवा
“मिषत् इति” मिलता है।
“मिषत्” का अर्थ है
— “स्पन्दन करने वाला”, “चेष्टा
करने वाला” या “जीवित रूप
से विद्यमान”।
पदच्छेद
/ संधि-विच्छेद
- आत्मा वा इदम् एकः एव अग्रे आसीत्।
- न अन्यत् किञ्चन मिषत्।
- सः ईक्षत।
- लोकान् नु सृजा इति।
व्याकरणिक
संकेत
- आत्मा — प्रथमा एकवचन; परमात्मतत्त्व।
- आसीत् — √अस् (भू धातु), लङ् लकार; “था”।
- मिषत् — √मिष् धातु; स्पन्दन या जीवित होने का बोध।
- ईक्षत — √ईक्ष् (देखना, चिन्तन करना); आत्मनेपदी रूप।
- सृजा — √सृज् धातु; “मैं रचना करूँ” ऐसा संकल्प।
अन्वय
(गद्यक्रम)
अग्रे
इदं सर्वम् आत्मा एव एकः आसीत्।
अन्यत् किञ्चन अपि न मिषत्।
सः आत्मा ईक्षत — “लोकान् नु सृजा” इति।
शब्दार्थ एवं हिंदी अर्थ
शब्दार्थ
- आत्मा — परम चैतन्य, ब्रह्म
- अग्रे — सृष्टि से पूर्व
- एक एव — केवल एक
- नान्यत्किञ्चन — अन्य कुछ भी नहीं
- मिषत् — स्पन्दित, जीवित, क्रियाशील
- ईक्षत — विचार किया, संकल्प किया
- लोकान् — विभिन्न अनुभव-क्षेत्र
- सृजा — उत्पन्न करूँ
भावपूर्ण
हिंदी अर्थ
सृष्टि
के पूर्व केवल आत्मा ही
था — एकमेव अद्वितीय। उसके अतिरिक्त कुछ
भी स्पन्दित या विद्यमान नहीं
था। उसी आत्मा ने
विचार किया — “मैं लोकों की
रचना करूँ।”
आदि
शंकराचार्य का भाष्य (मूल संस्कृत)
आत्मेति।
आत्मा — आप्नोतेरत्तेरततेर्वा परः सर्वज्ञः सर्वशक्तिः,
अशनायादिसंसारधर्मवर्जितः,
नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभावः।
इदं
यदुक्तं नामरूपकर्मभेदभिन्नं जगत्, आत्मैवैकः अग्रे जगतः सृष्टेः प्राक्
आसीत्।
प्रागुत्पत्तेः
अव्याकृतनामरूपभेदम् आत्मभूतम् जगत् आत्मैकशब्दप्रत्ययगोचरम्। इदानीं तु व्याकृतभेदत्वात् अनेकशब्दप्रत्ययगोचरम्।
यथा
सलिलात् पृथक् फेननामरूपव्याकरणात् प्राक् सलिलमेव; तथा जगत् अपि
आत्मैव।
नान्यत्किञ्चन
मिषत् — न किञ्चिदपि स्वतन्त्रं
प्रधानम्, न परमाणवः, न
अन्यत् किञ्चिदस्ति।
स
ईक्षत — लोकान् सृजे इति। ननु
कार्यकरणाभावात् कथम् ईक्षितवान्? न
दोषः; सर्वज्ञस्वाभाव्यात्।
“अपाणिपादो
जवनो ग्रहीता” इति मन्त्रवर्णात्।
शंकरभाष्य
का हिंदी अनुवाद
शंकराचार्य
कहते हैं कि यहाँ
“आत्मा” शब्द परम ब्रह्म
के लिए प्रयुक्त हुआ
है — वह सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान,
नित्य, शुद्ध, बुद्ध और मुक्त स्वरूप
है। उसमें संसार के भूख, दुःख,
परिवर्तन आदि धर्म नहीं
हैं।
यह
सम्पूर्ण नाम-रूपमय जगत्
सृष्टि से पहले उसी
आत्मा में अव्यक्त रूप
से स्थित था। उस समय
जगत् में पृथक्-पृथक्
नाम और रूप नहीं
थे; इसलिए वह केवल “आत्मा”
के रूप में ही
जाना जाता था। सृष्टि
के बाद वही जगत्
अनेक नामों और रूपों में
प्रकट हुआ।
शंकराचार्य
जल और फेन का
उदाहरण देते हैं। जैसे
फेन उत्पन्न होने से पहले
केवल जल ही था,
वैसे ही सृष्टि से
पूर्व केवल आत्मा ही
था।
“नान्यत्किञ्चन
मिषत्” का अर्थ है
— आत्मा के अतिरिक्त कोई
स्वतन्त्र सत्ता नहीं थी; न
सांख्य का “प्रधान”, न
वैशेषिकों के परमाणु।
जब
कहा जाता है कि
आत्मा ने “ईक्षण” किया,
तो प्रश्न उठता है कि
इन्द्रियों के बिना वह
कैसे देख या सोच
सकता है? शंकराचार्य उत्तर
देते हैं — ब्रह्म की सर्वज्ञता स्वाभाविक
है; उसे ज्ञान के
लिए बाहरी उपकरणों की आवश्यकता नहीं।
दार्शनिक
विश्लेषण
(क)
मन्त्र का मुख्य तात्त्विक विषय
यह मन्त्र मूलतः अद्वैतात्मक सृष्टिदर्शन का उद्घोष है।
यहाँ सृष्टि का कारण कोई
जड़ पदार्थ नहीं, बल्कि स्वयं चेतन आत्मा है।
यह उपनिषद् का महावाक्यात्मक उद्घाटन
है कि अस्तित्व का
आधार चेतना है।
(ख)
सृष्टि और आत्मा का सम्बन्ध
यहाँ
सृष्टि को आत्मा से
पृथक् नहीं माना गया।
जगत् आत्मा का “परिणाम” नहीं,
बल्कि उसकी अभिव्यक्ति है।
शंकराचार्य इसे “नामरूपव्याकरण” कहते
हैं — अर्थात् एक ही चेतना
अनेक रूपों में व्यक्त होती
है।
(ग)
अद्वैत वेदान्त की स्थापना
शंकराचार्य
इस मन्त्र से तीन बातों
की स्थापना करते हैं—
- ब्रह्म ही जगत् का उपादान कारण है।
- ब्रह्म ही निमित्त कारण है।
- ब्रह्म से पृथक् कोई स्वतन्त्र सत्ता नहीं है।
इस प्रकार यह मन्त्र सांख्य
के “प्रधानवाद” और वैशेषिक के
“परमाणुवाद” का खण्डन करता
है।
(घ)
स्वप्रकाश चेतना और साक्षीभाव
“आत्मा”
यहाँ केवल “व्यक्ति” नहीं, बल्कि वह स्वप्रकाश चेतना
है जो स्वयं को
और सबको प्रकाशित करती
है।
यह मन्त्र अप्रत्यक्ष रूप से “साक्षीभाव”
की स्थापना करता है—
- सृष्टि से पूर्व भी चेतना थी।
- नाम-रूप बदलते हैं, पर साक्षी चेतना अपरिवर्तित रहती है।
- अनुभवों का प्रवाह बदलता है, पर “मैं हूँ” का मूल बोध स्थिर रहता है।
लेखक
की शोधात्मक टिप्पणी / आधुनिक विमर्श
(क)
Consciousness Studies से
सम्बन्ध
आधुनिक
Consciousness Studies में
“Hard Problem of Consciousness” यह
प्रश्न उठाता है कि भौतिक
पदार्थ से चेतना कैसे
उत्पन्न होती है। ऐतरेयोपनिषद्
इसका उल्टा प्रतिपादन करता है — पदार्थ
चेतना से प्रकट होता
है।
यह दृष्टि “Primacy of
Consciousness” के सिद्धान्त के निकट है।
(ख)
Phenomenology से
तुलना
Edmund Husserl ने
“Pure Witnessing Consciousness” की
चर्चा की। उनका कहना
था कि अनुभवों के
पीछे एक शुद्ध अवलोकनशील
चेतना रहती है।
ऐतरेयोपनिषद्
इससे आगे जाकर कहता
है—
- चेतना केवल अनुभव की साक्षी नहीं,
- बल्कि सम्पूर्ण अस्तित्व का मूलाधार है।
Husserl की
“epoché” (सभी धारणाओं का स्थगन) और
उपनिषद् का “नेति-नेति”
एक गहरे दार्शनिक संवाद
में दिखाई देते हैं।
(ग)
Psychology और
Selfhood
आधुनिक
मनोविज्ञान “Narrative
Self” और “Witness
Self” में भेद करता है।
व्यक्ति का सामाजिक व्यक्तित्व
बदलता रहता है, पर
भीतर एक निरन्तर आत्मबोध
रहता है।
उपनिषद्
इसी “Witness Self” को परमात्मा की
दिशा में विस्तारित करता
है।
(घ)
Cognitive Science और
Observer Theory
Quantum Observer Theory में
प्रेक्षक की भूमिका महत्वपूर्ण
मानी जाती है। यद्यपि
उपनिषद् का प्रतिपादन वैज्ञानिक
सिद्धान्त नहीं है, फिर
भी दोनों में एक समान
प्रश्न है—
“क्या
चेतना केवल पर्यवेक्षक है,
या वास्तविकता की संरचना में
उसकी मूल भूमिका है?”
ऐतरेयोपनिषद्
का उत्तर स्पष्ट है — चेतना ही
मूल सत्ता है।
(ङ)
अन्य उपनिषदों से तुलनात्मक संकेत
यह मन्त्र अनेक उपनिषदों के
साथ गहरे रूप से
सम्बद्ध है—
- छान्दोग्य उपनिषद् — “सदेव सोम्य इदमग्र आसीत्”
- बृहदारण्यक उपनिषद् — “आत्मैवेदमग्र आसीत्”
- माण्डूक्य उपनिषद् — सम्पूर्ण जगत् चैतन्य की अभिव्यक्ति है।
(च)
आधुनिक जीवन में प्रासंगिकता
आज का मनुष्य बाहरी
पहचान, उपभोग और मानसिक विखण्डन
में उलझा है। यह
मन्त्र स्मरण कराता है—
- व्यक्ति का मूल स्वरूप सामाजिक भूमिकाएँ नहीं,
- बल्कि शुद्ध चेतना है।
- आन्तरिक स्थिरता बाह्य उपलब्धियों से नहीं,
- आत्मबोध से आती है।
साधना
एवं आत्मचिन्तन संकेत
यह मन्त्र ध्यान में अत्यन्त उपयोगी
है। साधक निम्न प्रकार से चिन्तन कर
सकता है—
“विचारों
से पहले क्या है?”
“अनुभवों के पीछे कौन
साक्षी है?”
“क्या मैं बदलते अनुभव
हूँ, या उन्हें जानने
वाली चेतना?”
यह अभ्यास धीरे-धीरे witnessing awareness अर्थात् साक्षीभाव को प्रकट करता
है।
ऐतरेयोपनिषद्
का यह मन्त्र अद्वैत वेदान्त की मूल घोषणा है कि सम्पूर्ण जगत् का आधार चेतना है। सृष्टि से पूर्व केवल आत्मा था, और वही अनेक नाम-रूपों में प्रकट हुआ। शंकराचार्य इस मन्त्र द्वारा आत्मैकत्व, स्वप्रकाश चेतना और ब्रह्म की सर्वाधार सत्ता की स्थापना करते हैं। आधुनिक चेतना-विमर्श में भी यह मन्त्र गहन दार्शनिक प्रासंगिकता रखता है, क्योंकि यह मनुष्य को बाह्य जगत् से भीतर की साक्षी चेतना की ओर ले जाता है।
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