कई महीनों से मैं उस बंद घड़ी को दीवार से उतारना चाहता हूँ।
उसकी सुइयाँ तीन बजकर सत्रह मिनट पर अटकी हुई हैं।
न आगे बढ़ती हैं, न पीछे लौटती हैं।
बस उसी एक क्षण में जमी हुई हैं
जैसे समय ने वहाँ आकर साँस रोक ली हो।
पहले मुझे उसकी बंद पड़ी टिक-टिक से परेशानी होती थी।
फिर एक दिन अचानक एहसास हुआ कि असल परेशानी उसकी ख़ामोशी नहीं,
उसका रुका हुआ होना है।
कमरे में बाकी सब कुछ चलता रहता है।
सुबह आती है, धूप दीवार पर सरकती है, शाम होते-होते परछाइयाँ लंबी हो जाती हैं।
मोबाइल की स्क्रीन पर तारीख़ें बदलती रहती हैं।
लोग फ़ोन करते हैं, हाल पूछते हैं, अपने-अपने दिनों की थकान सुनाते हैं।
लेकिन उस घड़ी में
समय अब भी वहीं खड़ा है।
मुझे ठीक-ठीक याद भी नहीं
कि वह किस दिन बंद हुई थी।
शायद उसी दिन जब घर में पहली बार बहुत लंबी ख़ामोशी उतरी थी।
या शायद उस शाम,
जब जाते हुए किसी ने पीछे मुड़कर नहीं देखा था।
मनुष्य अक्सर बड़ी घटनाओं की तारीख़ें भूल जाता है।
उसे बस इतना याद रहता है
कि उसके बाद समय पहले जैसा नहीं रहा।
कई बार मैं कुर्सी खींचकर उसके नीचे खड़ा होता हूँ।
सोचता हूँ, बैटरी बदल दूँ।
इतनी-सी बात है।
एक नई बैटरी, और सुइयाँ फिर चलने लगेंगी।
लेकिन फिर मन में एक अजीब-सा डर उठता है।
क्या होगा अगर घड़ी फिर चल पड़ी
और मुझे महसूस हुआ कि जो कुछ रुका हुआ लगता था,
वह दरअसल बहुत पहले आगे बढ़ चुका है?
शायद इसीलिए मैंने उसे वैसे ही छोड़ दिया है।
अब वह घड़ी समय बताने के काम नहीं आती।
वह सिर्फ़ यह याद दिलाती है
कि कुछ क्षण हमारे भीतर इतने गहरे धँस जाते हैं
कि उनसे बाहर निकलने के बाद भी
हमारा एक हिस्सा वहीं अटका रह जाता है।
कभी-कभी देर रात
जब पूरा घर बिल्कुल शांत होता है,
मुझे भ्रम होता है
कि घड़ी अब भी चल रही है।
बहुत ध्यान से सुनो तो
उसकी रुकी हुई सुइयों के भीतर कहीं
एक बेहद धीमी टिक-टिक बची हुई लगती है।
शायद वह मेरी अपनी धड़कन होती है।
या शायद स्मृति की आवाज़।
अजीब बात है
चलती हुई घड़ियाँ हमें कभी उतना उदास नहीं करतीं
जितना बंद पड़ी हुई घड़ियाँ।
क्योंकि चलती हुई घड़ियाँ सिर्फ़ समय बताती हैं।
लेकिन बंद घड़ियाँ
उस एक पल की रखवाली करती रहती हैं
जिसे हम जाने नहीं देना चाहते।
आज सुबह धूप सीधे उस पर पड़ रही थी।
काँच पर हल्की धूल जमी थी,
और रुकी हुई सुइयाँ उस धूल के पीछे कुछ धुँधली दिखाई दे रही थीं।
मैंने बहुत देर तक उसे देखा।
फिर अचानक लगा
शायद हम सब भीतर से कहीं-न-कहीं
एक बंद घड़ी ही हैं।
बाहर से चलते हुए,
अंदर किसी एक समय पर हमेशा के लिए रुके हुए।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,
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