कई दिनों से मैं उस पुरानी कुर्सी को फेंक देना चाहता हूँ।
लकड़ी जगह-जगह से उखड़ गई है, एक बाँह हल्की-सी हिलती है, और बैठने पर उससे एक बहुत धीमी चरमराहट उठती है—जैसे कोई बूढ़ा आदमी नींद में करवट ले रहा हो।
लेकिन हर बार, जब मैं उसे बाहर रखने के लिए हाथ बढ़ाता हूँ, कुछ मुझे रोक देता है।
शायद इसलिए कि उस कुर्सी पर अब सिर्फ़ एक वस्तु नहीं बची।
वहाँ समय बैठा है।
कमरे में नई चीज़ें आती रहीं—नई किताबें, नया पर्दा, नया फ़ोन, नई आदतें तक।
लेकिन वह कुर्सी हमेशा वहीं रही, खिड़की के पास, उसी कोण पर मुड़ी हुई जहाँ शाम की धूप आकर थोड़ी देर ठहरती है।
मुझे याद है, कभी पिता उस पर बैठकर अख़बार पढ़ते थे।
फिर एक समय आया जब मैं देर रात उसी पर बैठकर लिखने लगा।
और अब कई बार ऐसा होता है कि मैं उस कुर्सी को खाली देखता हूँ और अजीब तरह से महसूस करता हूँ कि कोई अभी-अभी वहाँ से उठा है।
मनुष्य जिन चीज़ों के साथ बहुत समय बिताता है, वे धीरे-धीरे वस्तुएँ नहीं रहतीं।
वे हमारी अनुपस्थितियों की आकृति बन जाती हैं।
कभी-कभी रात में जब पूरा घर सो जाता है, मैं सिर्फ़ उस कुर्सी को देखता रहता हूँ।
उसकी पीठ पर हल्की धूल जमी होती है।
लकड़ी के किनारों पर उँगलियों के पुराने निशान हैं।
और उसकी एक टाँग थोड़ी छोटी है, इसलिए कोई भी उस पर बैठे तो वह बहुत हल्का-सा डगमगाती है।
अजीब बात है—मनुष्य भी शायद ऐसे ही होते हैं।
ऊपर से साबुत दिखते हुए, भीतर कहीं थोड़ा असंतुलित।
मैंने कई बार सोचा है,
क्या हम सच में चीज़ों को सँभालकर रखते हैं,
या वे हमें सँभाले रखती हैं?
क्योंकि सच यह है कि उस कुर्सी को हटाने का मतलब सिर्फ़ कमरे में जगह बनाना नहीं होगा।
उसका मतलब होगा यह स्वीकार करना कि कुछ समय सचमुच बीत चुका है।
कि जिन लोगों की उपस्थिति कभी इस घर की हवा में घुली रहती थी, वे अब सिर्फ़ स्मृति हैं।
और मनुष्य स्मृतियों से ज़्यादा किसी चीज़ से नहीं डरता।
उन्हें खो देने से भी नहीं—
उनके पूरी तरह सच हो जाने से।
बाहर की दुनिया लगातार बदल रही है।
नए मकान बन रहे हैं, नए लोग शहरों में आ रहे हैं, पुरानी दुकानें बंद हो रही हैं।
लेकिन इस कमरे में वह कुर्सी अब भी वैसी ही रखी है,
जैसे समय यहाँ आकर थोड़ा थम गया हो।
कभी-कभी मुझे लगता है,
हम सबके जीवन में एक ऐसी कुर्सी होती है
कोई वस्तु, कोई व्यक्ति, कोई जगह
जिसे हम इसलिए नहीं छोड़ पाते क्योंकि उसके चले जाने के बाद हमें अपने वर्तमान के साथ अकेले रहना पड़ेगा।
आज शाम फिर मैंने सोचा था कि उसे बाहर रख दूँगा।
मैंने उसके हत्थे पर हाथ भी रखा।
लकड़ी ठंडी थी।
लेकिन फिर खिड़की से आती हवा थोड़ी तेज़ हुई,
कुर्सी बहुत हल्के से हिली,
और एक पल के लिए लगा
जैसे किसी ने अभी-अभी वहाँ बैठकर उठने से पहले अपनी जगह ठीक की हो।
मैंने हाथ वापस खींच लिया।
शायद कुछ चीज़ें इसलिए नहीं बची रहतीं कि वे उपयोगी हैं।
वे इसलिए बची रहती हैं
क्योंकि उनके बिना कमरा सिर्फ़ कमरा रह जाता है
जीवन नहीं।
मुकेश ,,,,,,,,
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