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Sunday, 17 May 2026

कई बार जब तुम मुझसे बातें करती थीं,

 कई बार

जब तुम मुझसे बातें करती थीं,

तो मुझे लगता था

तुम्हें ख़ामोशी से बहुत डर लगता है।


तुम किसी भी चुप्पी को

ज़्यादा देर टिकने नहीं देती थीं।

वह चाहे कितनी ही छोटी क्यों न हो

तुम तुरंत कोई बात ले आती थीं बीच में।


किसी सहेली का ज़िक्र,

ऑफ़िस की कोई उलझन,

रास्ते में देखी हुई कोई अजीब-सी घटना,

या फिर अचानक यह पूछ लेना कि

“तुम सुन भी रहे हो न?”


और मैं उस वक़्त

थोड़ा मुस्कुरा देता था भीतर-ही-भीतर।

क्योंकि सच तो यह था

कि कई बार मैं आधा ही सुन रहा होता था।


आधा तुम्हें,

और आधा अपने भीतर चलते हुए किसी और विचार को।


तुम्हें शायद अंदाज़ा भी नहीं था

कि जब तुम लगातार बोल रही होती थीं,

मैं कई बार तुम्हारी आवाज़ से अलग होकर

तुम्हारे होने के बारे में सोचने लगता था।


कि यह स्त्री,

जो इतनी साधारण बातों में उलझी हुई लगती है,

आख़िर मेरे जीवन में इतनी गहराई तक कैसे उतर आई।


कई बार मुझे तुम्हारी बातें

बहुत घरेलू लगती थीं।

इतनी कि उनमें कोई कविता नहीं दिखाई देती थी।


लेकिन अब समझ में आता है

जीवन हमेशा कविताओं में नहीं रहता।

उसका बड़ा हिस्सा

रसोई की भाप,

देर रात की थकान,

बेवजह की शिकायतों

और रोज़ दोहराई जाने वाली बातों में छुपा होता है।


तुम शायद प्रेम को

बहुत बड़े शब्दों में नहीं जानती थीं।

तुम्हारा प्रेम

बहुत छोटे तरीक़ों से प्रकट होता था।


जैसे यह पूछना कि

“आज फिर देर तक जागोगे क्या?”

या यह कहना कि

“इतनी गंभीर बातें मत किया करो, अजीब लगने लगता है।”


और उस समय

मुझे लगता था

तुम मुझे समझ नहीं पातीं।


अब लगता है,

शायद तुम मुझे मेरी अपेक्षा ज़्यादा समझती थीं।


क्योंकि जिन बातों को मैं दर्शन समझता था,

वे कई बार सिर्फ़ मेरी उदासी थीं।

और तुम उन्हें

बहुत साधारण ढंग से हल्का कर देना चाहती थीं।


तुम्हारी दुनिया में

चाय ठंडी हो जाना

किसी अस्तित्ववादी संकट से ज़्यादा वास्तविक था।

और मेरी दुनिया में

एक अधूरी पंक्ति

पूरे दिन की बेचैनी बन जाती थी।


हम दोनों अलग थे।

इतने अलग

कि कई बार आश्चर्य होता है

इतनी देर तक साथ कैसे रहे।


लेकिन शायद मनुष्य

समानताओं से नहीं टिकते हमेशा।

कई बार वे एक-दूसरे की अधूरी जगहों में टिके रहते हैं।


तुम मेरी गंभीरता में

थोड़ी हल्की हवा की तरह थीं।

और मैं शायद

तुम्हारी साधारण दुनिया में

थोड़ी अनावश्यक गहराई।


अब जब पीछे मुड़कर देखता हूँ,

तो तुम्हारी कही हुई बहुत-सी बातें याद नहीं रहीं।

पर तुम्हारा लगातार बोलते रहना याद है।


ठीक वैसे ही

जैसे किसी पुराने घर को छोड़ देने के बाद

वहाँ की घड़ी की आवाज़ याद रह जाती है

समय नहीं।


मुकेश ,,,,,,

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