सच कहूँ,
कई बार मैं तुम्हारी बातों से ऊब जाता था।
ख़ासकर तब,
जब तुम वही बातें फिर से दोहराने लगती थीं—
किसी दफ़्तर की छोटी-सी घटना,
किसी रिश्तेदार की आदत,
या दिनभर की कोई ऐसी बात
जिसका दुनिया में शायद कोई अर्थ नहीं था।
तुम एक ही बात को
थोड़ा बदल-बदल कर कहती रहती थीं,
और मैं
बिना अपनी अरुचि ज़ाहिर किए
तुम्हें सुनता रहता था
बहुत देर तक।
कभी-कभी तुम्हारी आवाज़
मुझे बारिश नहीं,
पंखे की लगातार चलती हुई ध्वनि जैसी लगने लगती थी—
एक ऐसी आवाज़
जो कमरे में हमेशा मौजूद रहती है,
इतनी कि धीरे-धीरे वह सुनाई देना बंद हो जाती है।
लेकिन अजीब बात यह है
कि आज उन्हीं दोहराई हुई बातों की सबसे ज़्यादा कमी महसूस होती है।
अब समझ में आता है
कि प्रेम हमेशा असाधारण बातों से नहीं बना होता।
कई बार वह उन्हीं उबाऊ विवरणों से बनता है
जिन्हें हम उस समय महत्व नहीं देते।
और शायद तुम भी
मेरी बातों से थक जाती होगी।
जब मैं देर तक
अध्यात्म,
ज्ञान,
समय,
मृत्यु,
अस्तित्व
या मनुष्य के भीतर के खालीपन पर बोलता रहता था।
तुम बीच-बीच में
अधकचरी-सी बहस करती थीं,
कुछ तर्क देती थीं
जो कई बार किताबों की बजाय
सिर्फ़ तुम्हारे अनुभव से निकले होते थे।
और मैं भीतर-ही-भीतर सोचता था—
मैं तुमसे इतने गंभीर विषयों पर बात ही क्यों करता हूँ?
तुम्हें शायद उन बातों में
उतनी दिलचस्पी नहीं थी।
तुम जीवन को
मेरी तरह विचारों में नहीं,
दिनचर्या में जीती थीं।
तुम्हारे लिए प्रेम का अर्थ
शायद यह जानना था
कि मैंने खाना खाया या नहीं,
मैं ठीक से सोया या नहीं,
या बारिश में भीगकर लौटा तो चाय पी या नहीं।
और मैं
तुम्हारे सामने ब्रह्मांड, आत्मा और मौन की बातें खोलकर बैठ जाता था।
अब पीछे मुड़कर देखता हूँ
तो लगता है
हम दोनों एक-दूसरे को पूरी तरह समझने की कोशिश कभी कर ही नहीं रहे थे।
हम बस
अपने-अपने तरीक़े से
एक-दूसरे के पास बने रहने की कोशिश कर रहे थे।
तुम मेरी गंभीरताओं को सहती थीं,
मैं तुम्हारी दोहराव भरी बातों को।
और शायद प्रेम कई बार यही होता है—
किसी व्यक्ति की उन बातों को भी सुनते रहना
जो तुम्हारे भीतर कोई चमत्कार पैदा नहीं करतीं,
फिर भी उन्हें बीच में रोकने का मन नहीं करता।
क्योंकि धीरे-धीरे
मनुष्य बातों से नहीं,
आवाज़ों से जुड़ने लगता है।
और एक दिन ऐसा आता है
जब वही आवाज़,
जिससे कभी हल्की-सी ऊब होती थी,
दुनिया की सबसे गहरी ख़ामोशी बन जाती है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,
"सच कहूँ,
कई बार मैं तुम्हारी बातों से ऊब जाता था।"
यह रचना आपकी श्रृंखला की अब तक की सबसे मानवीय और सबसे ईमानदार कविताओं में से एक है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह प्रेम को आदर्श या अलौकिक बनाकर नहीं दिखाती, बल्कि उसकी थकान, ऊब, दोहराव और साधारणता को भी स्वीकार करती है। यही स्वीकार इसे गहरा बनाता है।
अधिकांश प्रेम-कविताएँ प्रिय की अनुपस्थिति, सौंदर्य या विरह को केंद्र बनाती हैं; लेकिन यहाँ प्रेम का सबसे कम चर्चित पक्ष सामने आता है—“साथ रहते हुए होने वाली ऊब”। और यही इस कविता को असाधारण बनाता है।
आरम्भ की पंक्तियाँ—
“सच कहूँ,
कई बार मैं तुम्हारी बातों से ऊब जाता था…”
बहुत जोखिम भरी पंक्तियाँ हैं। क्योंकि यहाँ कवि प्रेमी की आदर्श छवि तोड़ देता है। लेकिन यही जोखिम कविता को विश्वसनीय बनाता है। यह स्वीकार कि प्रिय की हर बात अद्भुत नहीं लगती थी, संबंध को अधिक वास्तविक बनाता है। यहाँ प्रेम किसी निरंतर रोमांच का नाम नहीं, बल्कि मनुष्य की अपूर्णताओं को धीरे-धीरे सहने की प्रक्रिया बन जाता है।
कविता का सबसे प्रभावी रूपक है—
“तुम्हारी आवाज़
मुझे बारिश नहीं,
पंखे की लगातार चलती हुई ध्वनि जैसी लगने लगती थी…”
यह अत्यंत सूक्ष्म और आधुनिक बिम्ब है। यहाँ ऊब को किसी नाटकीय प्रतीक से नहीं, बल्कि घरेलू ध्वनि से व्यक्त किया गया है। पंखे की आवाज़ हमेशा उपस्थित रहती है, इतनी कि एक समय बाद हम उसे सुनना बंद कर देते हैं। यही संबंधों की आदत बन जाने की अवस्था है। यह रूपक बहुत सफल है क्योंकि इसमें करुणा भी है और थकान भी।
लेकिन कविता यहीं रुकती नहीं। उसका असली मोड़ तब आता है जब वही दोहराव बाद में स्मृति और अभाव में बदल जाता है।
“अब समझ में आता है
कि प्रेम हमेशा असाधारण बातों से नहीं बना होता…”
यहाँ कविता एक निजी अनुभव से निकलकर सार्वभौमिक हो जाती है। यह बोध अत्यंत परिपक्व है कि प्रेम बड़े क्षणों से कम और मामूली बातों की निरंतरता से अधिक बनता है।
कविता का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष है—बौद्धिक असमानता और भावात्मक संतुलन। वक्ता अध्यात्म, ज्ञान, अस्तित्व जैसे विषयों में डूबा है, जबकि स्त्री जीवन को अधिक व्यवहारिक और अनुभवात्मक स्तर पर जीती है। यह विरोध बहुत सुंदर ढंग से आया है:
“तुम जीवन को
मेरी तरह विचारों में नहीं,
दिनचर्या में जीती थीं।”
यह पंक्ति पूरी कविता की दार्शनिक धुरी है। यहाँ कवि पहली बार यह स्वीकार करता है कि समझ हमेशा समान बौद्धिकता से नहीं आती। कई बार जो व्यक्ति आपके विचारों को नहीं समझता, वही आपके जीवन को सबसे अधिक थामे रहता है।
सबसे सुंदर बात यह है कि कविता अंततः किसी निष्कर्ष या श्रेष्ठता-बोध में नहीं जाती। कवि यह नहीं कहता कि वह अधिक गहरा था या स्त्री अधिक सरल। वह सिर्फ़ यह समझता है कि दोनों अपने-अपने तरीक़े से साथ बने रहने की कोशिश कर रहे थे। यही भाव कविता को करुण और परिपक्व बनाता है।
शिल्प की दृष्टि से यह कविता आपकी पिछली रचनाओं की तुलना में अधिक संतुलित है। इसमें रूपक कम हैं, इसलिए भाव अधिक सीधे उतरते हैं। भाषा अपेक्षाकृत सादी है, और यही इसकी शक्ति है। यहाँ “कहना” ज़्यादा है, “सजाना” कम। इसीलिए इसका असर अधिक अंतरंग और वास्तविक बनता है।
यदि एक आलोचनात्मक टिप्पणी करनी हो, तो यह कहा जा सकता है कि कविता के मध्य भाग में “अध्यात्म, ज्ञान, समय, मृत्यु…” जैसी सूची थोड़ी अपेक्षित लगती है; वहाँ कोई अधिक निजी या अप्रत्याशित विवरण होता, तो प्रभाव और बढ़ सकता था। लेकिन समग्रता में यह बहुत छोटी बात है।
समग्रतः यह कविता प्रेम के उस चरण की कविता है जहाँ आकर्षण पीछे छूट चुका है और मनुष्य पहली बार दूसरे की आदत, उपस्थिति और आवाज़ के वास्तविक अर्थ को समझने लगता है। यह प्रेम का रोमानी नहीं, बल्कि अस्तित्वगत रूप है।
शायद इसीलिए इसकी सबसे मार्मिक पंक्ति अंत में आती है—
“मनुष्य बातों से नहीं,
आवाज़ों से जुड़ने लगता है।”
यहीं कविता अपने निजी अनुभव से निकलकर जीवन का एक शांत, सार्वभौमिक सत्य बन जाती है।
एक पाठक ,,
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