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Sunday, 17 May 2026

फिर एक समय ऐसा आया, जब हमारे बीच बातचीत तो होती थी,

 फिर एक समय ऐसा आया,

जब हमारे बीच बातचीत तो होती थी,

पर उसमें पहले जैसी बेचैनी नहीं बची थी।


जैसे कोई नदी अब भी बह रही हो,

लेकिन उसके पानी में पहाड़ों की वह ठंडक न रही हो

जो कभी हथेलियों को सुन्न कर देती थी।


तुम अब भी “कैसे हो” पूछती थीं,

मैं अब भी “ठीक हूँ” कह देता था,

मगर इन दो वाक्यों के बीच

जो लंबा रास्ता हुआ करता था,

वह धीरे-धीरे सूखने लगा था।


पहले तुम्हें अपने दिन की सबसे मामूली बात बताने का मन होता था।

जैसे रास्ते में अचानक देखी हुई कोई पीली खिड़की,

या किसी बच्चे का सड़क किनारे साबुन के बुलबुले बनाना।

और तुम उन बातों को ऐसे सुनती थीं

मानो दुनिया की सबसे ज़रूरी चीज़ वही हो।


लेकिन फिर जीवन ने शायद हम दोनों को

थोड़ा-थोड़ा व्यस्त,

थोड़ा-थोड़ा थका हुआ

और बहुत अधिक भीतर से चुप कर दिया।


अब हमारी बातचीत में

ख़ामोशियाँ पहले से ज़्यादा रहने लगी थीं।

वे असहज नहीं थीं,

पर उनमें वह गर्माहट भी नहीं थी

जिसमें दो लोग बिना कुछ कहे भी एक-दूसरे के पास महसूस होते हैं।


कभी-कभी तुम अचानक बहुत देर तक बोलती थीं।

अपने कमरे के बारे में,

अपने शहर की बारिश के बारे में,

या किसी पुराने गीत के बारे में

जो तुम्हें बिना वजह उदास कर गया था।


और मैं तुम्हारी आवाज़ सुनते हुए सोचता था

मनुष्य पूरी तरह कभी बदलता नहीं।

उसके भीतर कहीं न कहीं

वही पुराना मौसम बचा रहता है।


बस अब वह हर दिन नहीं आता।


पहले तुम्हारी उपस्थिति

मेरे दिनों पर फैली रहती थी

जैसे सर्दियों की धूप

धीमी, लगातार, भरोसेमंद।


अब तुम कभी-कभी आती हो

जैसे बादलों के बीच अचानक खुला हुआ नीला टुकड़ा।

सुंदर,

पर क्षणिक।


मुझे याद है,

एक रात तुम बहुत देर तक चुप रहीं।

मैंने सोचा शायद बात समाप्त हो गई।

फिर अचानक तुमने कहा—

“कुछ रिश्ते शायद धीरे-धीरे पुराने घरों जैसे हो जाते हैं।”


उस वक़्त मैं कुछ नहीं बोला।

लेकिन आज समझता हूँ

कि तुम सही कह रही थीं।


पुराने घर टूटते नहीं तुरंत।

पहले उनकी दीवारों का रंग फीका पड़ता है,

फिर खिड़कियाँ कम खुलती हैं,

फिर लोग कुछ कम लौटते हैं वहाँ।


और एक दिन

वहाँ सब कुछ मौजूद रहता है

बस जीवन नहीं।


फिर भी,

अजीब बात है कि ऐसे घरों से मोहब्बत खत्म नहीं होती।

मन बार-बार उनकी तरफ़ लौटता है।

सिर्फ़ यह देखने के लिए

कि क्या किसी कमरे में अब भी थोड़ी रोशनी बची हुई है।


शायद हमारे बीच भी

अब वही आख़िरी रोशनी बची हुई है

धीमी, काँपती हुई,

मगर पूरी तरह बुझी नहीं।


मुकेश ,,,,,,

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