अब हमारी बातें उस मौसम की तरह हो गई हैं
जिसमें बारिश रुक-रुक कर होती है।
कभी अचानक बहुत चमकीली धूप निकल आती है
इतनी साफ़, इतनी असम्बद्ध,
कि लगता है जैसे बारिश कभी थी ही नहीं।
जैसे किसी और ही मौसम ने थोड़ी देर के लिए दुनिया अपने हाथ में ले ली हो।
उन क्षणों में तुम बिल्कुल अलग लगती हो।
हल्की, व्यस्त, दूर।
तुम्हारी आवाज़ में नमी नहीं होती,
सिर्फ़ एक साधारण उजाला होता है
जिसमें मेरे गहरे प्रश्न थोड़े अनावश्यक लगने लगते हैं।
फिर अचानक बादल घिर आते हैं।
ऐसा लगता है अब बारिश होगी
ठीक वैसी, जैसी पहले हुआ करती थी।
लंबी, स्थिर, भीतर तक उतरती हुई।
लेकिन अब अक्सर ऐसा नहीं होता।
दो-चार बूँदें गिरती हैं,
खिड़की पर एक हल्की-सी ध्वनि होती है,
और फिर सब कुछ थम जाता है।
बादल भी चले जाते हैं अपने साथ बारिश को लेकर,
जैसे वे सिर्फ़ याद दिलाने आए थे
कि कभी यहाँ एक मौसम रहा करता था।
हाँ, कुछ दिन अब भी ऐसे आते हैं
जब थोड़ी देर सचमुच बारिश होती है।
तुम कुछ देर खुलकर बात करती हो,
अपने भीतर की कोई थकान, कोई डर, कोई अधूरी बात रख देती हो।
और तब मुझे महसूस होता है
दीवार अब भी भीग सकती है।
लेकिन अब वह भीगना ऊपर-ही-ऊपर होता है।
नमी भीतर तक नहीं उतरती।
बस सतह थोड़ी देर चमकती है
और फिर धीरे-धीरे सूख जाती है।
शायद इसलिए क्योंकि अब मैं दीवार बन गया हूँ
और तुम्हारी बातें बारिश।
पहले मैं बरसता था और तुम चुपचाप भीगती थीं।
अब तुम आती हो—अनियमित, अस्थायी, मौसमों की तरह
और मैं स्थिर खड़ा रहता हूँ।
मुझे अब समझ में आता है कि दीवार होना कितना कठिन है।
बाहर से स्थिर दिखाई देना,
और भीतर धीरे-धीरे सीलन इकट्ठा करते रहना।
तुम्हारी हर अधूरी बात
मेरे भीतर एक हल्की नमी छोड़ जाती है।
कोई देख नहीं पाता,
पर कुछ जगहें लगातार गीली बनी रहती हैं।
और अजीब बात यह है कि
अब मैं तुम्हारे बरसने की प्रतीक्षा नहीं करता
मैं सिर्फ़ आसमान देखता रहता हूँ।
कि शायद आज बादल थोड़ा देर ठहरें।
शायद आज बारिश दो-चार बूँदों से आगे बढ़े।
शायद आज यह दीवार सिर्फ़ ऊपर-ऊपर नहीं,
थोड़ी भीतर तक भीग जाए।
लेकिन मौसमों की अपनी विवशताएँ होती हैं।
वे किसी एक घर, एक खिड़की, एक दीवार के लिए नहीं रुकते।
फिर भी, हर बार जब हल्की-सी बारिश होती है,
मैं अनायास थोड़ा चमक उठता हूँ
ठीक वैसे ही
जैसे पुराने घरों की दीवारें
बरसात के बाद कुछ देर के लिए नई लगने लगती हैं।
मुकेश ,,,,,,,
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