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Thursday, 28 May 2026

अब मैं रास्तों से उनकी मंज़िल नहीं पूछता।

 अब मैं रास्तों से

उनकी मंज़िल नहीं पूछता।


कुछ रास्ते

सिर्फ़ इस लिए सुंदर होते हैं

कि वे कहीं नहीं पहुँचते।


जैसे शाम का धुँधलका 

न पूरा दिन,

न पूरी रात।


बस दोनों के बीच

ठहरा हुआ एक मुलायम रंग।


मैंने अब लोगों को भी

समझना छोड़ दिया है।

हर आदमी के भीतर

एक बंद कमरा होता है

जहाँ वह ख़ुद भी

बहुत कम जाता है।


कभी-कभी

पूरी रात नींद नहीं आती,

मगर कोई बेचैनी भी नहीं होती।


मैं अँधेरे में लेटा

छत को देखता रहता हूँ,

जैसे कोई पुराना मुसाफ़िर

रेलवे स्टेशन पर

बिना ट्रेन का इंतज़ार किए बैठा हो।


अब यादें भी

पहले जैसी नहीं रहीं।

वे चुभती नहीं,

बस धीरे-धीरे

आकर पास बैठ जाती हैं।


और फिर

कुछ देर बाद

बिना आवाज़ किए चली जाती हैं।


शायद उम्र

इंसान को समझदार नहीं बनाती,

बस उसकी तकलीफ़ों की आवाज़ धीमी कर देती है।


मुकेश ,,,,,,,,,,

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