एक वक़्त था
जब मैं हर चीज़ को नाम देना चाहता था
मोहब्बत, दूरी, इंतज़ार, तन्हाई।
अब लगता है
नाम रख देने से
चीज़ें छोटी हो जाती हैं।
इसलिए अब
जो महसूस होता है,
उसे बस महसूस होने देता हूँ।
कभी पूरा दिन
एक बंद किताब की तरह पड़ा रहता है।
मैं उसके पास बैठा रहता हूँ,
मगर कोई सफ़ा नहीं खोलता।
अजीब बात है
अब ख़ालीपन भी
ख़ाली नहीं लगता।
उसमें
पुरानी आवाज़ों की धूल है,
कुछ अधूरे ख़्वाबों की गंध,
और बहुत-सी बीती हुई शामें।
मैंने सीखा है
कि हर दर्द रोता नहीं,
और हर सुकून मुस्कुराता भी नहीं।
कुछ एहसास
बस कमरे में रखी उस कुर्सी की तरह होते हैं
जिस पर वर्षों से
कोई बैठा नहीं,
फिर भी वह
अपनी जगह से हटती नहीं।
अब जीवन से
कोई बहस नहीं होती।
वह जैसा है,
वैसा ही सामने बैठा रहता है
और मैं
उसकी आँखों में देखे बिना
उसके साथ चाय पी लेता हूँ।
मुकेश ,,,,,
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