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Thursday, 28 May 2026

अब भीतर कोई तूफ़ान नहीं उठता।

 अब भीतर

कोई तूफ़ान नहीं उठता।


समंदर जैसे

अपनी सारी बेचैन लहरें

किसी बहुत दूर रात में छोड़ आया हो।


दिन गुज़र जाते हैं

बिना किसी निशान के।

मैं उन्हें गिनता भी नहीं।


कभी बालकनी में खड़े होकर

लोगों को लौटते देखता हूँ —

थके हुए, जल्दी में,

अपनी-अपनी ज़रूरतों के साथ।


और मुझे लगता है,

हर आदमी

किसी अदृश्य चीज़ का पीछा कर रहा है।


मैंने शायद

बहुत पहले रुककर

उस पीछा करने की आदत छोड़ दी थी।


अब अगर कोई पूछे

क्या चाहिए 

तो जवाब सोचने में भी वक़्त लगता है।


क्योंकि चाहतें

धीरे-धीरे शरीर से ऐसे उतर जाती हैं

जैसे बारिश के बाद

दीवारों से नमी उतरती है।


न कोई बड़ी तकलीफ़ है,

न कोई ख़ास राहत।


बस एक साधारण-सा दिन है

जो हर रोज़

थोड़ा-थोड़ा दोहराया जाता है।


और मैं

उस दोहराव में भी

कोई अर्थ ढूँढने की कोशिश नहीं करता।


शायद यही वजह है

कि अब थकान भी

सुकून जैसी लगने लगी है।


मुकेश ,,,,,,,,

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