कल रात
फ्रिज की हल्की आवाज़ में
मुझे समुद्र सुनाई देता रहा।
मैं रसोई में गया
तो देखा —
मेज़ पर रखा नींबू
धीरे-धीरे सूखते हुए
किसी छोटे ग्रह जैसा लग रहा था।
घर में
कई दिनों से
कोई ऊँची आवाज़ नहीं हुई थी।
फिर भी
दीवारों पर
तनाव की एक पतली परत जमी थी,
जैसे धुएँ की।
मैंने खिड़की खोली।
सामने वाली इमारत में
एक आदमी
रात के दो बजे
अपनी शर्ट इस्त्री कर रहा था।
इतनी रात गए
कौन
अपने कपड़ों की सिलवटें ठीक करता है?
शायद वही लोग
जो दिन भर
अपनी आत्मा की सिलवटें छुपाते रहे हों।
दूर कहीं
एक कुत्ता भौंका,
फिर सब कुछ
अचानक बहुत साफ़ सुनाई देने लगा —
घड़ी की टिक-टिक,
नल से गिरती बूँद,
मेरी साँस,
और भीतर
लगातार चलता हुआ
कोई पुराना पछतावा।
सुबह तक
नींबू और सिकुड़ गया था।
और मुझे लगा
समय
असल में इसी तरह बीतता है —
धीरे-धीरे
अपनी नमी खोते हुए।
— मुकेश
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