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Tuesday, 26 May 2026

रेखाएँ

 रेखाएँ

कुछ रेखाएँ
सीधी चलती हैं
जैसे किसी बूढ़े शिक्षक की आवाज़ 
धीमी, संयमित,
जिसमें जीवन का बहुत-सा शोर
पहले ही बैठ चुका हो।

कुछ रेखाएँ
तिरछी उतरती हैं काग़ज़ पर
मानो कोई भीतर ही भीतर
भाग रहा हो कहीं 
अपने ही डर से,
अपने ही भविष्य से।

गोल रेखाएँ
मुझे हमेशा माँ की उँगलियों जैसी लगीं,
वे किसी कठोर वस्तु को भी
धीरे-धीरे स्पर्श में बदल देती हैं।

और टूटी हुई रेखाएँ...

वे शायद सबसे सच्ची होती हैं।

वे बताती हैं
कि हर मनुष्य
एक जगह जाकर टूटता है 
बिना आवाज़ के।

एक चित्रकार
जब अकेला होता है,
तो वह वस्तुएँ नहीं बनाता,
वह अपनी चुप्पियों की रेखाएँ खींचता है।

कभी एक लंबी काली रेखा
पूरी रात की थकान बन जाती है,
कभी काँपती हुई पतली रेखा
किसी पुराने प्रेम की बची हुई स्मृति।

मैंने एक दिन
एक बच्चे को दीवार पर
बेतरतीब रेखाएँ बनाते देखा।

वह हँस रहा था।

शायद मनुष्य
जन्म से ही जानता है
कि शब्दों से पहले
रेखाएँ बोलती हैं।

और शायद मृत्यु के बाद भी
हम स्मृतियों में
रेखाओं की तरह ही बचे रहते हैं 
अधूरे, काँपते हुए,
धीरे-धीरे मिटते हुए।

मुकेश ,,,,,,


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