होम | रोज़नामचा | कविताएँ | कहानियाँ | विचार | ज्योतिष | लेखक

Sunday, 10 May 2026

कभी-कभी

कभी-कभी
भीड़ के बीच खड़े होकर भी
ऐसा लगता है
जैसे मैं कहीं मौजूद ही नहीं हूँ।

लोग चेहरा देखते हैं,
मैं अपनी थकान छुपाता हूँ।

कुछ रिश्ते
अब सिर्फ आदत की तरह बचे हैं,
मोहब्बत की तरह नहीं।

और रात…
रात हर रोज़
मेरे भीतर का सन्नाटा
थोड़ा और बड़ा कर जाती है।

— मुकेश

No comments:

Post a Comment