अब बातचीत भी
सिर्फ लफ़्ज़ों तक रह गई है…
दिल तो कब का
चुप होना सीख चुका है।
लोग पूछते हैं
“इतने ख़ामोश क्यों रहते हो?”
कैसे बताऊँ,
कुछ आवाज़ें अंदर
इतना शोर करती हैं
कि बाहर बोलने का मन नहीं करता।
मैं मुस्कुरा तो देता हूँ,
मगर सच ये है—
अब हँसी और उदासी में
ज़्यादा फ़र्क़ नहीं बचा।
— मुकेश
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