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Monday, 18 May 2026

मुण्डक उपनिषद् के सम्बन्धभाष्य पर शोधपूर्ण अध्ययन

 मुण्डक उपनिषद् के सम्बन्धभाष्य पर शोधपूर्ण अध्ययन

आदि शंकराचार्य कृत भाष्य की दार्शनिक भूमिका


सम्बन्धभाष्य (संस्कृत मूलयथारूप)

ब्रह्मा देवानामित्याद्याथर्वणोपनिषत्
ब्रह्मादेसम्बन्धमादावेवाह स्वयमेव स्तुत्यर्थम्
एवं हि महद्भिः परमपुरुषार्थसाधनत्वेन गुरुणा5ऽयासेन लब्धा विद्येति श्रोतृबुद्धिप्ररोचनाय विद्यां महीकरोति।
स्तुत्या प्ररोचितायां हि विद्यायां सादराः प्रवर्तेरन्निति।
प्रयोजनेन तु विद्यायाः साध्यसाधनलक्षणसंबन्धमुत्तवक्ष्यति — “भिद्यते हृदयग्रन्थिःइत्यादिना।
अत्र अपरशब्दवाच्यायामृग्वेदादिलक्षणायां विधिप्रतिषेधमात्रपरायां विद्यायां संसारकारणाविद्यादिदोषनिवर्तकत्वं नास्तीति स्वयमेवोक्त्वा परापरविद्याभेदकरणपूर्वकम् — “अविद्यायामन्तरे वर्तमानाइत्यादिना।
तथा परप्राप्तिसाधनं सर्वसाधनसाध्यविषयवैराग्यपूर्वकगुरुप्रसादलभ्यां ब्रह्मविद्यामाह — “परीक्ष्य लोकान्इत्यादिना।
प्रयोजनं चासकृदत्र वक्ष्यति — “ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवतिइति।
परामृताः परिमुच्यन्ति सर्वेइति च।
ज्ञानमात्रे यद्यपि सर्वाश्रमिणामधिकारस्तथा5पि संन्यासनिष्ठैव ब्रह्मविद्या मोक्षसाधनं कर्मसहिता इति — “भैक्ष्यचर्यां चरन्तः” “संन्यासयोगात्इति ब्रुवन् दर्शयति।
विद्याकर्मविरोधाच्च।
हि ब्रह्मात्मैकत्वदर्शनेन सह कर्म स्वप्नेऽपि सम्पादयितुं शक्यम्।
विद्यायाः कालविशेषाभावादिनियतनिमित्तत्वात्कालसंकोचनानुपपत्तिः।
यत्तु गृहस्थेषु ब्रह्मविद्यासम्प्रदायकर्तृत्वादिलिङ्गं तात्त्विकस्थैर्यं बाधितुमुत्सहते।
हि विधिशतेनापि तमःप्रकाशयोरेकत्र सद्भावः शक्यते कर्तुम्।
किमुत लिङ्गैकैः।
एवमुक्तसम्बन्धप्रयोजनाया उपनिषदोऽल्पाक्षरं ग्रन्थविवरणमारभ्यते।
इमां ब्रह्मविद्यामुपयन्त्यात्मभावेन श्रद्धाभक्तिपुरःसराः सन्तस्तेषां गर्भजन्मजरारोगाद्यनर्थपूर्णं निशातयति, परं वा ब्रह्म गमयति, अविद्यादिसंसारकारणं चात्यन्तमवसादयति विनाशयतीत्युपनिषत्।
उपनिपूर्वस्य सदेरेवमर्थस्मरणात्॥

सम्बन्धभाष्य का अन्वय

अथर्वणोपनिषत्ब्रह्मा देवानाम्इत्यादि।
ब्रह्मादेः सम्बन्धम् आदौ एव आह, स्वयमेव स्तुत्यर्थम्।

एवं हि महद्भिः परमपुरुषार्थसाधनत्वेन गुरुणा आयासेन लब्धा विद्या इति श्रोतृबुद्धिप्ररोचनाय विद्यां महीकरोति।

स्तुत्या प्ररोचितायां हि विद्यायां सादराः प्रवर्तेरन् इति।

प्रयोजनेन तु विद्यायाः साध्यसाधनलक्षणसम्बन्धम्भिद्यते हृदयग्रन्थिःइत्यादिना उत्तवक्ष्यति।

अत्र अपरशब्दवाच्यायाम् ऋग्वेदादिलक्षणायाम् विधिप्रतिषेधमात्रपरायाम् विद्यायाम् संसारकारण-अविद्यादिदोषनिवर्तकत्वं नास्ति इति स्वयम् उक्त्वा, परापरविद्याभेदकरणपूर्वकम्अविद्यायामन्तरे वर्तमानाइत्यादिना।

तथा परप्राप्तिसाधनं सर्वसाधनसाध्यविषयवैराग्यपूर्वकगुरुप्रसादलभ्यां ब्रह्मविद्याम्परीक्ष्य लोकान्इत्यादिना आह।

सन्धि-विच्छेद

प्रथम खण्ड

  • ब्रह्मादेसम्बन्धम् = ब्रह्मादेः + सम्बन्धम्
  • आदावेवाह = आदौ + एव + आह
  • स्तुत्यर्थम् = स्तुति + अर्थम्

द्वितीय खण्ड

  • परमपुरुषार्थसाधनत्वेन = परम + पुरुषार्थ + साधनत्वेन
  • श्रोतृबुद्धिप्ररोचनाय = श्रोतृ + बुद्धि + प्ररोचनाय
  • विद्यां महीकरोति = विद्याम् + महीकरोति

तृतीय खण्ड

  • साध्यसाधनलक्षणसंबन्धम् = साध्य + साधन + लक्षण + सम्बन्धम्
  • भिद्यते हृदयग्रन्थिः = भिद्यते + हृदय + ग्रन्थिः

चतुर्थ खण्ड

  • अपरशब्दवाच्यायाम् = अपर + शब्द + वाच्यायाम्
  • ऋग्वेदादिलक्षणायाम् = ऋग्वेद + आदि + लक्षणायाम्
  • विधिप्रतिषेधमात्रपरायाम् = विधि + प्रतिषेध + मात्र + परायाम्
  • संसारकारणाविद्यादिदोषनिवर्तकत्वम् = संसार + कारण + अविद्या + आदि + दोष + निवर्तकत्वम्

पंचम खण्ड

  • परापरविद्याभेदकरणपूर्वकम् = परा + अपर + विद्या + भेद + करण + पूर्वकम्
  • सर्वसाधनसाध्यविषयवैराग्यपूर्वक = सर्व + साधन + साध्य + विषय + वैराग्य + पूर्वक
  • गुरुप्रसादलभ्याम् = गुरु + प्रसाद + लभ्याम्

षष्ठ खण्ड

  • ब्रह्मात्मैकत्वदर्शनेन = ब्रह्म + आत्म + एकत्व + दर्शनेन
  • विद्याकर्मविरोधात् = विद्या + कर्म + विरोधात्
  • कालसंकोचनानुपपत्तिः = काल + संकोचन + अनुपपत्तिः

सप्तम खण्ड

  • गर्भजन्मजरारोगाद्यनर्थपूर्णम् = गर्भ + जन्म + जरा + रोग + आदि + अनर्थ + पूर्णम्
  • श्रद्धाभक्तिपुरःसराः = श्रद्धा + भक्ति + पुरःसराः
  • अविद्यादिसंसारकारणम् = अविद्या + आदि + संसार + कारणम्

 

भाष्य का हिन्दी अनुवाद (यथारूप)

ब्रह्मा देवानाम्आदि से आरम्भ होने वाली यह अथर्ववेदीय उपनिषद् प्रारम्भ में ही ब्रह्मा आदि के सम्बन्ध का वर्णन स्वयं स्तुति के उद्देश्य से करती है।

क्योंकि यह विद्या महान पुरुषों द्वारा परम पुरुषार्थ अर्थात् मोक्ष का साधन मानकर गुरु के प्रयत्न से प्राप्त की गई है, इसलिए श्रोताओं की बुद्धि को प्रेरित करने के लिए इसकी महिमा कही जाती है।

जब स्तुति द्वारा विद्या के प्रति आदर उत्पन्न होता है, तब लोग श्रद्धापूर्वक उसमें प्रवृत्त होते हैं।

फिरभिद्यते हृदयग्रन्थिःआदि वचनों द्वारा इस विद्या के साध्य और साधनरूप सम्बन्ध का वर्णन किया जाएगा।

यहाँ ऋग्वेद आदि रूप अपरविद्या, जो केवल विधि और निषेध तक सीमित है, उसमें संसाररूप अविद्या के नाश की शक्ति नहीं हैयह स्वयं कहकर, फिर परा और अपरा विद्या का भेदअविद्यायामन्तरे वर्तमानाआदि मन्त्रों से किया गया है।

तथापरीक्ष्य लोकान्आदि मन्त्रों द्वारा यह कहा गया है कि गुरु की कृपा से प्राप्त होने वाली ब्रह्मविद्या ही परब्रह्म की प्राप्ति का साधन है, जिसके लिए समस्त साध्य-विषयों में वैराग्य आवश्यक है।

यद्यपि ज्ञान में सभी आश्रमों का अधिकार है, तथापि संन्यासनिष्ठ ब्रह्मविद्या ही मोक्ष का साधन है, कर्मयुक्त नहीं। इसेभैक्ष्यचर्यां चरन्तः”, “संन्यासयोगात्आदि श्रुतियों से दिखाया गया है।

क्योंकि ज्ञान और कर्म परस्पर विरोधी हैं।
ब्रह्म और आत्मा की एकता के दर्शन के साथ कर्म का सम्पादन स्वप्न में भी सम्भव नहीं।

 

मुण्डकोपनिषद् के सम्बन्धभाष्य का अद्वैत-दर्शनात्मक अध्ययन

प्रस्तावना

मुण्डक उपनिषद् पर आदि शंकराचार्य का यह सम्बन्धभाष्य केवल उपोद्घात नहीं, बल्कि सम्पूर्ण अद्वैत वेदान्त का घोषणापत्र है। इसमें आचार्य ने

  • विद्या का स्वरूप,
  • परा और अपरा विद्या का भेद,
  • मोक्ष का साधन,
  • गुरु की भूमिका,
  • वैराग्य की आवश्यकता,
  • तथा ज्ञान-कर्म-विरोध

सभी को अत्यन्त सूक्ष्मता से स्थापित किया है।

 

 

 

विद्या की स्तुति क्यों?

भाष्य का प्रारम्भ हीस्तुत्यर्थम्शब्द से होता है।
शंकराचार्य बताते हैं कि उपनिषद् ब्रह्मविद्या की महिमा इसलिए करती है ताकि श्रोता के भीतर उसके प्रति श्रद्धा जागृत हो।

भारतीय परम्परा में ज्ञान केवल सूचना नहीं, बल्कि साधना है।
अतः बिना श्रद्धा के ब्रह्मविद्या का ग्रहण सम्भव नहीं।

यहाँ स्तुति का उद्देश्य मनोवैज्ञानिक है
विद्या के प्रति आन्तरिक आदर उत्पन्न करना।

परा और अपरा विद्या का भेद

यह भाष्य अद्वैत वेदान्त के सबसे महत्वपूर्ण सिद्धान्तों में से एक को स्थापित करता है

अपरा विद्या

  • ऋग्वेद
  • यजुर्वेद
  • सामवेद
  • अथर्ववेद
  • शिक्षा, कल्प, व्याकरण आदि

ये सब अपरा विद्या हैं क्योंकि ये कर्म, विधि और निषेध तक सीमित हैं।

परा विद्या

वह विद्या जिससे

अक्षर ब्रह्मका ज्ञान हो।

शंकराचार्य के अनुसार केवल परा विद्या ही अविद्या का नाश करती है।

 

अविद्या का सिद्धान्त

भाष्य में स्पष्ट कहा गया है

संसारकारणाविद्यादिदोषनिवर्तकत्वं नास्ति

अर्थात् कर्मप्रधान विद्या संसार के मूल कारण अविद्या का नाश नहीं कर सकती।

यह अद्वैत वेदान्त का मूल सिद्धान्त है

  • संसार का कारण अविद्या है,
  • और उसका नाश केवल ज्ञान से सम्भव है।

 

गुरु और वैराग्य

भाष्य में कहा गया

गुरुप्रसादलभ्यां ब्रह्मविद्याम्

यहाँ गुरु को केवल शिक्षक नहीं, बल्कि चेतना-जागरण का माध्यम माना गया है।

इसी प्रकार

सर्वसाधनसाध्यविषयवैराग्यपूर्वक

यह बताता है कि ब्रह्मविद्या का अधिकारी वही है जो समस्त सांसारिक साध्यों के प्रति वैराग्य प्राप्त कर चुका हो।

 

ज्ञान और कर्म का विरोध

भाष्य का सबसे क्रान्तिकारी भाग है

विद्याकर्मविरोधाच्च

शंकराचार्य के अनुसार

  • कर्म द्वैत पर आधारित है,
  • जबकि ज्ञान अद्वैत का अनुभव है।

कर्म में

  • कर्ता,
  • कर्म,
  • साधन,
  • फल

इन सबका भेद आवश्यक है।

किन्तु ब्रह्मज्ञान में यह समस्त भेद विलीन हो जाता है।

इसलिए वे कहते हैं

हि ब्रह्मात्मैकत्वदर्शनेन सह कर्म स्वप्नेऽपि सम्भवति।

 

संन्यास की अनिवार्यता

भाष्य में संन्यास को ब्रह्मविद्या का अनिवार्य आधार माना गया है।
यहाँ संन्यास केवल बाह्य वस्त्र परिवर्तन नहीं, बल्कि

  • अहंकार का त्याग,
  • कर्तृत्व का विसर्जन,
  • और आत्मस्वरूप में प्रतिष्ठा

है।

उपनिषद् शब्द की व्युत्पत्ति

भाष्य के अन्त में आचार्यउपनिषद्शब्द का दार्शनिक अर्थ देते हैं

यह विद्या

  • अविद्या का विनाश करती है,
  • संसार-दुःख को नष्ट करती है,
  • और साधक को परब्रह्म तक पहुँचाती है।

अतःउपनिषद्केवल ग्रन्थ नहीं, बल्कि मुक्ति की प्रक्रिया है।

 

मुण्डक उपनिषद् का यह सम्बन्धभाष्य अद्वैत वेदान्त की आधारशिला है। इसमें आदि शंकराचार्य ने यह प्रतिपादित किया कि

  • मोक्ष का साधन केवल ब्रह्मज्ञान है,
  • कर्म चित्तशुद्धि तक सीमित हैं,
  • अविद्या संसार का मूल कारण है,
  • गुरु और वैराग्य अनिवार्य हैं,
  • तथा आत्मा और ब्रह्म की एकता ही अंतिम सत्य है।

इस प्रकार यह सम्बन्धभाष्य सम्पूर्ण वेदान्त-दर्शन का सूक्ष्म बीजस्वरूप है।

 

आदि शंकराचार्य के भाष्य के आलोक में एक शोधपूर्ण गद्य-निबन्ध

भारतीय दार्शनिक परम्परा में उपनिषदों का स्थान केवल धार्मिक ग्रन्थों के रूप में नहीं, बल्कि मानव-चेतना के उच्चतम अन्वेषण के रूप में स्वीकार किया गया है। मुण्डक उपनिषद् उन उपनिषदों में विशेष महत्त्व रखता है जिनमें ब्रह्मविद्या को प्रत्यक्ष मोक्ष-साधन के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। इस उपनिषद् पर आदि शंकराचार्य द्वारा रचित सम्बन्धभाष्य केवल एक प्रस्तावना नहीं, बल्कि सम्पूर्ण अद्वैत वेदान्त की दार्शनिक संरचना का सूक्ष्म बीज है। इस भाष्य में आचार्य शंकर ने उपनिषद् के प्रयोजन, विषय, अधिकारी तथा मोक्ष के साधन का ऐसा गहन विवेचन किया है, जो भारतीय ज्ञानपरम्परा की अद्वितीय सूक्ष्मता को प्रकट करता है।

सम्बन्धभाष्य का आरम्भ ही ब्रह्मविद्या की स्तुति से होता है। प्रथम दृष्टि में यह केवल मंगलाचरण या प्रशंसात्मक भूमिका प्रतीत हो सकती है, किन्तु वास्तव में इसका उद्देश्य श्रोताओं के अन्तःकरण में ब्रह्मविद्या के प्रति श्रद्धा और गंभीरता उत्पन्न करना है। शंकराचार्य स्पष्ट करते हैं कि यह विद्या महान ऋषियों और गुरुओं द्वारा अत्यन्त प्रयत्न से प्राप्त की गई है तथा यह परमपुरुषार्थ अर्थात् मोक्ष का साधन है। भारतीय परम्परा में ज्ञान को केवल सूचना या बौद्धिक संग्रह नहीं माना गया; वह चेतना के रूपान्तरण की प्रक्रिया है। इसलिए जिस ज्ञान से आत्मा का आवरण हटता है और मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप का अनुभव करता है, उसके प्रति श्रद्धा का उदय आवश्यक है। आचार्य इसी कारण कहते हैं कि स्तुति द्वारा प्रेरित होकर ही साधक आदरपूर्वक विद्या में प्रवृत्त होता है।

इस भाष्य का एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण पक्ष परा और अपरा विद्या का विवेचन है। उपनिषद् स्वयं कहता है कि वेद, वेदाङ्ग तथा समस्त कर्मप्रधान शास्त्रअपरा विद्याहैं, जबकि वह ज्ञान जिससे अक्षर ब्रह्म का बोध हो — “परा विद्याहै। शंकराचार्य इस विभाजन को अत्यन्त गम्भीर दार्शनिक आधार प्रदान करते हैं। उनके अनुसार ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद तथा शिक्षा, कल्प, व्याकरण आदि का क्षेत्र मुख्यतः विधि और निषेध तक सीमित है। वे मनुष्य को धर्म, यज्ञ, कर्म और लौकिक-सामाजिक व्यवस्था का मार्ग दिखाते हैं, किन्तु संसार के मूल कारणअविद्याका नाश नहीं कर सकते। यही कारण है कि भाष्य में कहा गया है कि अपरा विद्या मेंसंसारकारणाविद्यादिदोषनिवर्तकत्वं नास्ति यह वाक्य अद्वैत वेदान्त का केन्द्रीय सिद्धान्त उद्घाटित करता है कि संसार का मूल कारण अज्ञान है और उसका नाश केवल आत्मज्ञान से सम्भव है।

आचार्य शंकर के अनुसार मोक्ष कोई नया फल नहीं है जिसे कर्मों के द्वारा उत्पन्न किया जाए। यदि मोक्ष किसी कर्म का परिणाम होता, तो वह अनित्य होता; क्योंकि प्रत्येक कर्मजन्य वस्तु परिवर्तनशील होती है। अद्वैत वेदान्त का दृष्टिकोण इससे भिन्न है। आत्मा स्वभावतः मुक्त है, किन्तु अविद्या के कारण जीव स्वयं को सीमित देह-मन-बुद्धि के रूप में अनुभव करता है। अतः मोक्ष वस्तुतः आत्मा की नयी प्राप्ति नहीं, बल्कि अज्ञान का निवारण है। इसी कारण उपनिषद् मेंभिद्यते हृदयग्रन्थिःकहा गया है। हृदयग्रन्थि यहाँ अविद्या, अहंकार और आसक्ति का प्रतीक है। जब ब्रह्मज्ञान उदित होता है, तब यह गाँठ कट जाती है और साधक अपने वास्तविक स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है।

सम्बन्धभाष्य में गुरु की भूमिका भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण रूप से प्रतिपादित हुई है। शंकराचार्य कहते हैं कि ब्रह्मविद्यागुरुप्रसादलभ्याहै। इसका आशय यह नहीं कि गुरु कोई बाहरी वरदान दे देता है, बल्कि यह कि आत्मज्ञान की दिशा में गुरु चेतना का मार्गदर्शक होता है। उपनिषद् परम्परा में ज्ञान पुस्तकीय नहीं, श्रुति-परम्परागत है। गुरु शिष्य के भीतर निहित सत्य को जागृत करता है। इसलिए मुण्डकोपनिषद् में शिष्य को आदेश दिया गया कि वह समिधा लेकर ब्रह्मनिष्ठ गुरु के समीप जाए। यहाँ गुरु केवल अध्यापक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक जागरण का माध्यम है।

भाष्य में वैराग्य को भी अनिवार्य साधन माना गया है। शंकराचार्य कहते हैं कि ब्रह्मविद्या उस साधक को प्राप्त होती है जो समस्त साध्य-विषयों के प्रति वैराग्य प्राप्त कर चुका हो। यह वैराग्य जीवन-विरोध नहीं, बल्कि अनित्यता का यथार्थ बोध है। जब मनुष्य संसार के समस्त भोगों और उपलब्धियों की सीमितता को पहचान लेता है, तब उसके भीतर उस सत्य की खोज आरम्भ होती है जो नश्वर नहीं है। इसी कारण उपनिषद् कहता है — “परीक्ष्य लोकान् कर्मचितान् ब्राह्मणो निर्वेदमायात्।अर्थात् कर्मों से प्राप्त होने वाले लोकों की परीक्षा करके विवेकी मनुष्य वैराग्य को प्राप्त होता है।

सम्बन्धभाष्य का सबसे गम्भीर और दार्शनिक रूप से क्रान्तिकारी पक्ष ज्ञान और कर्म के विरोध का प्रतिपादन है। शंकराचार्य स्पष्ट रूप से कहते हैं — “विद्याकर्मविरोधाच्च।उनके अनुसार कर्म और ज्ञान का आधारभूत दृष्टिकोण भिन्न है। कर्म द्वैत पर आधारित है। उसमें कर्ता, कर्म, साधन और फलइन सबका भेद आवश्यक है। किन्तु ब्रह्मज्ञान अद्वैत का अनुभव है, जहाँ ज्ञाता और ज्ञेय का भेद समाप्त हो जाता है। इसलिए आचार्य कहते हैं कि ब्रह्म और आत्मा की एकता का प्रत्यक्ष अनुभव होने पर कर्म का सम्पादन स्वप्न में भी सम्भव नहीं। यह विचार अद्वैत वेदान्त को अन्य वेदान्त-प्रणालियों से पृथक् करता है।

यद्यपि शंकराचार्य ज्ञान के अधिकारी के रूप में सभी आश्रमों को स्वीकार करते हैं, तथापि वे यह भी स्पष्ट करते हैं कि संन्यासनिष्ठा ही ब्रह्मविद्या की परिपूर्ण भूमि है। यहाँ संन्यास का अर्थ केवल बाहरी परित्याग नहीं, बल्कि अहंकार, कर्तृत्व और फलासक्ति का आन्तरिक विसर्जन है। जब तक मनुष्य स्वयं को कर्मकर्ता मानता है, तब तक अद्वैत का प्रत्यक्ष अनुभव सम्भव नहीं। अतः संन्यास अन्ततः चेतना की अवस्था है।

भाष्य के अन्त मेंउपनिषद्शब्द की व्युत्पत्ति का जो विवेचन मिलता है, वह अत्यन्त गूढ़ है। आचार्य के अनुसार यह विद्या अविद्या और संसाररूप दुःख का विनाश करती है तथा साधक को परब्रह्म की प्राप्ति कराती है। इस प्रकार उपनिषद् केवल एक ग्रन्थ नहीं, बल्कि आत्ममुक्ति की प्रक्रिया है। वह मनुष्य को बाह्य जगत् से भीतर की ओर, बहुलता से एकत्व की ओर और अज्ञान से आत्मप्रकाश की ओर ले जाती है।

अतः मुण्डकोपनिषद् का सम्बन्धभाष्य सम्पूर्ण अद्वैत वेदान्त की आधारभूमि के रूप में देखा जा सकता है। इसमें ब्रह्मविद्या की महिमा, अविद्या का सिद्धान्त, गुरु की आवश्यकता, वैराग्य का महत्त्व, ज्ञान-कर्म-विरोध तथा आत्ममुक्ति की प्रक्रियाइन सभी का ऐसा समन्वित और सूक्ष्म विवेचन प्राप्त होता है जो भारतीय दर्शन की ऊँचाइयों को प्रकट करता है। यह भाष्य केवल उपनिषद् की भूमिका नहीं, बल्कि मानव-चेतना के अंतिम प्रश्नों का दार्शनिक उद्घाटन है।

 

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