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Monday, 18 May 2026

मुण्डक उपनिषद् का शान्तिपाठ

 मुण्डक उपनिषद् का शान्तिपाठ

मन्त्र का संस्कृत यथावत् रूप

ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाभद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः।

स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिर्व्यशेमदेवहितं यदायुः।।

स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाःस्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः।

स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिःस्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु।।

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥

हिन्दी में सामान्य अर्थ

हे देवगण! हम अपने कानों से कल्याणकारी वचन सुनें, अपनी आँखों से मंगलमय दृश्य देखें। हम दृढ़ अंगों और स्वस्थ शरीरों के साथ आपकी स्तुति करते हुए ईश्वर द्वारा प्रदान की गई आयु को देवहितकारी कर्मों में व्यतीत करें।

महान यश वाले इन्द्र हमारा कल्याण करें, सर्वज्ञ पूषा हमारा कल्याण करें, अनिष्टों का नाश करने वाले तार्क्ष्य (गरुड़) हमारा कल्याण करें तथा देवगुरु बृहस्पति हमारा मंगल करें।

तीनों प्रकार के तापों — आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक — की शान्ति हो।

मन्त्र का अन्वय

हे देवाः!

वयं कर्णेभिः भद्रं शृणुयाम।

हे यजत्राः! अक्षभिः भद्रं पश्येम।

स्थिरैः अङ्गैः तनूभिः तुष्टुवांसः यत् आयुः देवहितम्, तत् व्यशेम।

वृद्धश्रवाः इन्द्रः नः स्वस्ति दधातु।

विश्ववेदाः पूषा नः स्वस्ति दधातु।

अरिष्टनेमिः तार्क्ष्यः नः स्वस्ति दधातु।

बृहस्पतिः नः स्वस्ति दधातु।

सन्धि-विच्छेद

प्रथम पंक्ति

भद्रं = भद्रम् 

कर्णेभिः = कर्ण + एभिः 

शृणुयाम = शृणु + याम 

देवा = देवाः 

द्वितीय पंक्ति

पश्येमाक्षभिः = पश्येम + अक्षभिः 

यजत्राः = यज् + त्र + आः 

तृतीय पंक्ति

स्थिरैरङ्गैः = स्थिरैः + अङ्गैः 

तुष्टुवांसः = तुष्टु + वांसः 

तनूभिर्व्यशेम = तनूभिः + व्यशेम 

चतुर्थ पंक्ति

देवहितं = देव + हितम् 

यदायुः = यत् + आयुः 

पंचम पंक्ति

स्वस्ति न इन्द्रो = स्वस्ति + नः + इन्द्रः 

वृद्धश्रवाः = वृद्ध + श्रवाः 

षष्ठ पंक्ति

नः पूषा = नः + पूषा 

विश्ववेदाः = विश्व + वेदाः 

सप्तम पंक्ति

नस्तार्क्ष्यः = नः + तार्क्ष्यः 

अरिष्टनेमिः = अरिष्ट + नेमिः 

अष्टम पंक्ति

नो बृहस्पतिः = नः + बृहस्पतिः 

दधातु = दधा + तु 

________________________________________

शान्तिपाठ क्या है?

वैदिक अध्ययन में “शान्तिपाठ” वह वैदिक प्रार्थना है जिसे किसी उपनिषद्, वेदाध्ययन, यज्ञ, ब्रह्मविद्या-चर्चा अथवा गुरु-शिष्य संवाद के पूर्व और पश्चात् बोला जाता है। इसका उद्देश्य केवल बाहरी शान्ति नहीं, बल्कि चेतना की समग्र सामंजस्यावस्था उत्पन्न करना है।

“शान्ति” यहाँ निष्क्रिय मौन नहीं, बल्कि—

इन्द्रियों की संतुलित अवस्था 

मन की ग्रहणशीलता 

बुद्धि की निर्मलता 

वातावरण की अनुकूलता 

और आत्मविद्या के लिए आन्तरिक पात्रता 

का सूचक है।

उपनिषद् ज्ञान केवल बौद्धिक सूचना नहीं है; वह अस्तित्वगत अनुभूति है। इसलिए अध्ययन से पूर्व साधक अपने भीतर और बाहर की बाधाओं को शांत करने की प्रार्थना करता है।

इस उपनिषद् के लिए यही शान्तिपाठ क्यों?

मुण्डक उपनिषद् मुख्यतः “परा” और “अपरा” विद्या का विवेचन करता है। यह उपनिषद् बाह्य कर्मकाण्ड से आगे बढ़कर ब्रह्मज्ञान की ओर ले जाता है। इसमें स्पष्ट कहा गया है—

“परिक्ष्य लोकान् कर्मचितान् ब्राह्मणो निर्वेदमायात्।”

अर्थात् कर्मों से प्राप्त होने वाले लोकों की सीमाओं को देखकर साधक ब्रह्मविद्या की ओर मुड़ता है।

ऐसे गूढ़ आत्मविद्या-प्रधान उपनिषद् के लिए यह शान्तिपाठ अत्यन्त उपयुक्त है, क्योंकि

 यहाँ “श्रवण” को विशेष महत्त्व है

मन्त्र का आरम्भ ही होता है—

“भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम”

उपनिषद् परम्परा में ब्रह्मविद्या का प्रथम साधन “श्रवण” है।

मुण्डक उपनिषद् गुरु से प्राप्त होने वाली विद्या का ग्रन्थ है। अतः यहाँ शुद्ध श्रवण की प्रार्थना अत्यन्त सार्थक है।


इन्द्रिय-शुद्धि की आवश्यकता

उपनिषद् केवल दार्शनिक चिन्तन नहीं, बल्कि चेतना का रूपान्तरण चाहता है।

यदि दृष्टि विक्षिप्त हो, मन अशान्त हो, शरीर दुर्बल हो — तो ब्रह्मविद्या ग्रहण नहीं हो सकती।

इसलिए मन्त्र कहता है—

“स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिः”

अर्थात् स्थिर शरीर और संतुलित इन्द्रियों के साथ हम जीवन व्यतीत करें।

अथर्ववेदीय स्वरूप

मुण्डक उपनिषद् अथर्ववेद से सम्बद्ध है। अथर्ववेद में शान्ति, संरक्षण, मानसिक संतुलन, उपचार और आध्यात्मिक रक्षा के अनेक मन्त्र मिलते हैं। यह शान्तिपाठ उसी अथर्ववेदीय चेतना को व्यक्त करता है जिसमें ज्ञान और कल्याण एक-दूसरे से पृथक नहीं हैं।

 त्रिविध तापों की निवृत्ति

अन्त में तीन बार “शान्तिः” कहा गया है

आध्यात्मिक (अन्तरद्वन्द्व, मोह, भय) 

आधिभौतिक (बाहरी संसार की बाधाएँ) 

आधिदैविक (दैवी या अप्रत्याशित शक्तियाँ) 

इन तीनों प्रकार की बाधाओं से मुक्ति के बिना ब्रह्मविद्या का अनुभव सम्भव नहीं माना गया।


शान्तिपाठ पर शोधात्मक निबन्ध

भारतीय वैदिक परम्परा में ज्ञान की प्राप्ति केवल बौद्धिक अभ्यास नहीं, बल्कि एक पवित्र आध्यात्मिक अनुशासन मानी गई है। इसी कारण प्रत्येक उपनिषद् के पूर्व “शान्तिपाठ” रखा गया। यह केवल मंगलाचरण नहीं, बल्कि सम्पूर्ण वैदिक दर्शन का सूक्ष्म सार है।

मुण्डक उपनिषद् का यह शान्तिपाठ विशेष रूप से इन्द्रियों, मन, शरीर और ब्रह्मविद्या के सम्बन्ध को उद्घाटित करता है।

शान्तिपाठ की वैदिक पृष्ठभूमि

वेदान्त में यह माना गया कि सत्य का अनुभव तभी सम्भव है जब साधक का अन्तःकरण निर्मल हो। इसलिए अध्ययन से पूर्व वातावरण को पवित्र और चेतना को एकाग्र करने हेतु शान्तिपाठ का विधान हुआ।

यह परम्परा केवल धार्मिक नहीं, मनोवैज्ञानिक भी है। आधुनिक मनोविज्ञान भी स्वीकार करता है कि ग्रहणशीलता के लिए मानसिक शान्ति आवश्यक है।

श्रवण और दर्शन का दार्शनिक अर्थ

मन्त्र में दो क्रियाएँ अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं—

शृणुयाम — हम सुनें 

पश्येम — हम देखें 

उपनिषद् परम्परा में “सुनना” केवल ध्वनि ग्रहण करना नहीं, बल्कि सत्य को आत्मा में उतरने देना है। इसी प्रकार “देखना” केवल दृश्य अनुभव नहीं, बल्कि वस्तुओं में सत्य का साक्षात्कार करना है।

इस प्रकार यह मन्त्र इन्द्रियों के आध्यात्मिकीकरण की बात करता है।

शरीर की भूमिका

भारतीय दर्शन प्रायः शरीर-विरोधी नहीं है।

यह मन्त्र स्पष्ट कहता है

“स्थिरैरङ्गैः”

अर्थात् स्थिर और स्वस्थ शरीर भी साधना का अनिवार्य आधार है।

यह योगदर्शन और वेदान्त के बीच एक गहरा सेतु निर्मित करता है।

देवताओं का प्रतीकात्मक अर्थ

इन्द्र — शक्ति और चेतना 

पूषा — पोषण और मार्गदर्शन 

तार्क्ष्य — रक्षा और विघ्ननाश 

बृहस्पति — ज्ञान और वाणी 

इस प्रकार यह मन्त्र मनुष्य के सम्पूर्ण व्यक्तित्व को संतुलित करने की प्रार्थना है।

त्रिशान्ति का रहस्य

अन्त में तीन बार “शान्तिः” कहना भारतीय आध्यात्मिकता का अत्यन्त गूढ़ संकेत है। यह स्वीकार करता है कि मनुष्य केवल व्यक्तिगत सत्ता नहीं, बल्कि ब्रह्माण्डीय व्यवस्था का भाग है।

इसलिए शान्ति केवल भीतर नहीं, बाहर और दैवी स्तर पर भी आवश्यक है।

मुण्डक उपनिषद् का यह शान्तिपाठ वैदिक संस्कृति की उस गहरी समझ को प्रकट करता है जिसमें ज्ञान, स्वास्थ्य, इन्द्रिय-संयम, मानसिक संतुलन और आध्यात्मिक उन्नति एक-दूसरे से अविच्छिन्न रूप से जुड़े हुए हैं।

यह केवल पाठ का आरम्भिक मन्त्र नहीं, बल्कि सम्पूर्ण उपनिषद् की दार्शनिक भूमिका है।

ब्रह्मविद्या के मार्ग पर चलने से पूर्व साधक को यह स्मरण कराया जाता है कि सत्य का अनुभव अशान्त, विक्षिप्त और असंतुलित चित्त में सम्भव नहीं।

अतः यह शान्तिपाठ वास्तव में “ब्रह्मज्ञान के योग्य बनने की प्रार्थना” है।


मुकेश ,,

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