घर में
एक आरामकुर्सी है
दादाजी के ज़माने की,
बेंत वाली।
जिस पर बैठकर
दादाजी ओवरकोट पहनते थे,
चुरुट पीते थे,
और हमें हमेशा
किसी पुराने अंग्रेज़ी फ़िल्म के किरदार जैसे लगते थे—
धीमे, सलीकेदार,
थोड़े दूर।
हम बच्चे
उसी कुर्सी पर झूला झूलते थे।
उसकी चरमराहट में
एक अजीब-सी खुशी होती थी।
दादाजी के जाने के बाद
बहुत दिनों तक
वह घर के एक कोने में खाली पड़ी रही।
धीरे-धीरे उसका रंग उतर गया।
बेंत कई जगह से बैठ गई।
लकड़ी पर हाथ फेरो
तो धूल उँगलियों से चिपक जाती है।
लेकिन न जाने क्यों
उसे कोई फेंकता नहीं।
शायद इसलिए कि
कुछ चीज़ें टूटने के बाद
सामान नहीं रहतीं
वंश की ख़ामोशी बन जाती हैं।
घर में
एक बंद घड़ी भी है।
कबाड़ में पड़ी हुई।
पुरानी चाबी वाली दीवार घड़ी।
काले शीशम की लकड़ी का भारी फ्रेम।
उसका शीशे वाला छोटा दरवाज़ा खोलकर
हम सूइयाँ ठीक किया करते थे।
और नीचे
पीतल का लंबा-सा पेंडुलम
हर वक़्त हिलता रहता था
जैसे समय को अपने कंधे पर ढो रहा हो।
अब वर्षों से
वह खुद रुका पड़ा है।
दादाजी ने उसे
अपनी पहली कमाई से खरीदा था।
शायद इसीलिए
उसे सँभालकर रखना
घरवालों की एक भावुक, लगभग बेकार कोशिश बन गया है।
क्योंकि सच तो यह है
कि अब कोई उसे ठीक नहीं करवाएगा।
बस हर साल सफ़ाई के वक़्त
उसे थोड़ा इधर से उधर रख दिया जाएगा—
इतना ही।
घर में
पुराना उषा का सीलिंग फैन भी है।
धूल से ढका हुआ।
कभी गर्मियों में
उसी की हवा में
पूरा घर सोया करता था।
अब ए.सी. आने के बाद
वह छत पर टंगा-टंगा
जैसे अपनी ही अप्रासंगिकता देख रहा है।
कभी-कभी सोचता हूँ
मशीनों को भी दुख होता होगा क्या?
माता जी की
हाथ से चलने वाली सिलाई मशीन भी है।
काली, भारी,
जिसके हैंडल को घुमाते हुए
वे घंटों बैठी रहती थीं।
उसी मशीन ने
हम लोगों की स्कूल ड्रेसें सिलीं,
बहन की फ्रॉकें,
पड़ोस की औरतों के ब्लाउज़,
तकियों के खोल,
पुराने पर्दों की सिलाइयाँ।
उस मशीन की आवाज़
कभी इस घर की धड़कन हुआ करती थी।
अब
माता जी के जाने के बाद
वह एक कोने में
बूढ़ी अम्मा की तरह पड़ी रहती है
चुप,
गुमसुम,
अपनी जंग लगी साँसों के साथ।
इन सब चीज़ों को देखता हूँ
तो कई बार लगता है—
मैं घर में नहीं रह रहा,
किसी संग्रहालय में रह रहा हूँ।
जहाँ हर वस्तु
अपने भीतर
एक बीता हुआ जीवन सँभाले बैठी है।
और सबसे अजीब बात यह है
कि उन चीज़ों के बीच
धीरे-धीरे मैं खुद भी
एक पुरानी वस्तु में बदलता जा रहा हूँ।
कभी-कभी डर लगता है
कहीं ऐसा न हो
कि एक दिन
इस घर के किसी कोने में
मेरी भी कोई आदत,
कोई चश्मा,
कोई कुर्सी
इसी तरह पड़ी रह जाए।
और आने वाली पीढ़ियाँ
उसे देखकर बस इतना कहें
“ये शायद इनके ज़माने की चीज़ होगी…”
मुकेश ,,,,,,,,
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