कई महीनों से उस कमरे की बत्ती ख़राब है।
स्विच दबाने पर कभी-कभी एक हल्की-सी झिलमिलाहट होती है,
फिर अँधेरा वापस उतर आता है—
जैसे रोशनी ने थोड़ी देर कोशिश की हो
और फिर थककर बैठ गई हो।
पहले मैं सोचता था,
कल इलेक्ट्रिशियन बुला लूँगा।
फिर “कल” धीरे-धीरे इतना लंबा हो गया
कि अब उस कमरे का अँधेरा
घर की बनावट का हिस्सा लगने लगा है।
दिन में भी वहाँ आधी रोशनी रहती है।
खिड़की छोटी है,
और पर्दे पर पुरानी धूल जमी है।
कमरे में रखी चीज़ें साफ़ दिखाई नहीं देतीं
बस उनकी आकृतियाँ दिखती हैं।
एक मेज़ है शायद।
या कोई पुराना संदूक।
दीवार पर कुछ टंगा हुआ है
जिसकी पहचान अब दूर से नहीं होती।
अजीब बात है
कुछ चीज़ें जब धुँधली हो जाती हैं,
तो हम उन्हें और ध्यान से देखने लगते हैं।
शायद इसलिए मैं उस कमरे में
पहले से ज़्यादा जाने लगा हूँ।
वहाँ बैठकर मुझे हमेशा लगता है
कि स्मृतियों का भी अपना प्रकाश होता है।
वे पूरी तरह उजाले में नहीं रहतीं।
अगर उन पर बहुत तेज़ रोशनी डालो,
तो उनका जादू टूटने लगता है।
उस कमरे में कभी माँ सिलाई किया करती थीं।
दोपहर की नींद से उठकर
धीरे-धीरे मशीन चलाती थीं,
और खिड़की से आती धूप
उनके हाथों पर टिक जाती थी।
अब वहाँ सिर्फ़ ख़ामोशी है।
लेकिन कभी-कभी,
बहुत ध्यान से सुनो,
तो लगता है
जैसे उस अँधेरे में अब भी कोई बहुत धीमी आवाज़ बची हुई है।
कपड़े के खिसकने की।
धागे के टूटने की।
या किसी के धीरे से खाँसने की।
मुझे पता है,
यह सच नहीं है।
कमरा ख़ाली है।
लेकिन मनुष्य जिन जगहों पर बहुत प्रेम छोड़ देता है,
वे जगहें पूरी तरह ख़ाली नहीं होतीं।
वे थोड़ी देर तक
अपनी दीवारों में लोगों को सँभाले रखती हैं।
मैंने एक दिन उस कमरे की बत्ती बदलने की कोशिश की थी।
नई बल्ब भी लगा दी।
एक पल के लिए पूरा कमरा अचानक उजाले से भर गया।
और उसी क्षण
मुझे बहुत बेचैनी हुई।
इतने उजाले में
सब कुछ बहुत स्पष्ट दिखाई देने लगा था
दीवारों की उखड़ी पपड़ी,
मेज़ पर जमी मोटी धूल,
खाली कुर्सी,
और वह कोना
जहाँ अब कुछ भी नहीं था।
मैंने तुरंत बत्ती बंद कर दी।
तब समझ में आया
कई बार हम अँधेरे में इसलिए नहीं रहते
कि हमें रोशनी नहीं मिल सकती,
बल्कि इसलिए
कि कुछ चीज़ें धुँधली दिखाई दें तो कम दुख देती हैं।
अब मैं कभी-कभी शाम को
चुपचाप उस कमरे में जाकर बैठ जाता हूँ।
बाहर से आती हल्की रोशनी
दीवार पर धीरे-धीरे सरकती रहती है।
और मुझे लगता है
हर घर में एक ऐसा कमरा ज़रूर होता है
जहाँ समय पूरी तरह नहीं बीतता।
वह बस
कम रोशनी में बैठा रहता है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,
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