कई दिनों से वह आधा भरा हुआ गिलास मेज़ पर रखा है।
पानी अब वैसा साफ़ नहीं दिखता।
उसमें धूल की बहुत महीन परत उतर आई है,
और सुबह की रोशनी पड़ती है
तो उसके भीतर कुछ छोटे-छोटे कण तैरते दिखाई देते हैं—
जैसे समय पानी में घुल गया हो।
मैं हर दिन सोचता हूँ
इसे खाली कर दूँगा।
सिर्फ़ उठाकर सिंक में उड़ेल देना है।
इतनी-सी बात।
लेकिन न जाने क्यों
हर बार हाथ रुक जाता है।
शायद इसलिए कि वह गिलास
अब सिर्फ़ गिलास नहीं रहा।
मुझे ठीक से याद नहीं
किसने आख़िरी बार उससे पानी पिया था।
मैंने?
या वह,
जो जाते-जाते आधा पानी छोड़ गई थी
और कहा था—
“अभी आती हूँ।”
मनुष्य कितनी आसानी से
कुछ शब्दों पर विश्वास कर लेता है।
“अभी आता हूँ।”
“फिर मिलते हैं।”
“ज़्यादा देर नहीं होगी।”
और फिर वही छोटे-छोटे वाक्य
कमरों में वर्षों तक पड़े रहते हैं,
ठीक उस आधे भरे गिलास की तरह।
कई बार रात में उठकर पानी पीते हुए
मेरी नज़र उस पर चली जाती है।
कमरे की पीली रोशनी में
वह अजीब उदास दिखाई देता है।
जैसे किसी ने बातचीत के बीच
अचानक बोलना बंद कर दिया हो।
अधूरी चीज़ों में एक अलग तरह की ख़ामोशी होती है।
पूरी तरह खाली गिलास इतना दुख नहीं देता
जितना आधा भरा हुआ।
क्योंकि खालीपन स्वीकार कर लिया गया होता है।
लेकिन आधा भरा होना
हमेशा किसी रुकावट, किसी वापसी, किसी इंतज़ार का संकेत देता है।
मैंने कई बार सोचा
उसे धोकर वापस रैक में रख दूँ।
जीवन में इतनी जगह तो होनी चाहिए
कि एक पुराना गिलास भी अनावश्यक न लगे।
लेकिन शायद बात गिलास की नहीं है।
शायद मैं उस छोटे-से भ्रम को बचाए रखना चाहता हूँ
कि कुछ चीज़ें अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुईं।
कि कोई अभी भी लौट सकता है।
कि कोई बातचीत
बस थोड़ी देर के लिए रुकी है।
सुबह जब खिड़की खुलती है,
हवा बहुत हल्के से पानी की सतह को छूती है।
और उसमें छोटी-सी लहर बनती है।
उसे देखकर कई बार लगता है
स्थिर दिखने वाली चीज़ें भी
भीतर कहीं बहुत धीरे-धीरे हिलती रहती हैं।
शायद मनुष्य भी ऐसे ही होते हैं।
बाहर से शांत,
अंदर बहुत हल्की कंपन के साथ।
आज फिर मैंने उस गिलास को उठाया।
बहुत देर तक हाथ में पकड़े रखा।
पानी ठंडा नहीं था अब।
फिर भी,
न जाने क्यों,
मैंने उसे फेंका नहीं।
कुछ चीज़ें हम इसलिए नहीं बचाए रखते
कि उनकी ज़रूरत होती है।
वे इसलिए बची रहती हैं
क्योंकि उनके भीतर
किसी अनुपस्थिति का आख़िरी स्पर्श रह जाता है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,
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