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Sunday, 17 May 2026

कई सालों से उस पुराने रेडियो में कोई आवाज़ नहीं आई।

 कई सालों से उस पुराने रेडियो में कोई आवाज़ नहीं आई।

उसका कपड़ा जगह-जगह से फीका पड़ गया है,

घुंडी घुमाने पर अब सिर्फ़ खरखराहट सुनाई देती है

जैसे बहुत दूर किसी सूने स्टेशन पर हवा चल रही हो।


फिर भी,

मैंने उसे कभी फेंका नहीं।


वह अब कमरे के एक कोने में रखा रहता है,

खिड़की के नीचे,

जहाँ दोपहर की धूप आकर उसके ऊपर धीरे-धीरे सरकती रहती है।


कभी इस घर में सुबहें उसी से खुलती थीं।

समाचार, पुराने गीत, मौसम का हाल,

और बीच-बीच में किसी उद्घोषक की वह स्थिर आवाज़

जो हर दिन लगभग एक जैसी लगती थी।


अजीब बात है—

कुछ आवाज़ें हमारे जीवन में इतनी लगातार मौजूद रहती हैं

कि हमें लगता है वे कभी समाप्त नहीं होंगी।


फिर एक दिन वे अचानक बंद हो जाती हैं।


मुझे याद है,

पिता रेडियो के बहुत पास बैठकर स्टेशन पकड़ने की कोशिश करते थे।

धीरे-धीरे घुंडी घुमाते,

फिर एक जगह आकर रुक जाते

जहाँ खरखराहट के बीच कोई धुन बहुत दूर से उभरती थी।


उस समय मुझे लगता था

दुनिया बहुत बड़ी है।

इतनी बड़ी

कि उसकी आवाज़ें हवा में तैरते हुए हमारे छोटे-से कमरे तक चली आती हैं।


अब दुनिया पहले से कहीं ज़्यादा पास है।

फ़ोन पर एक स्पर्श में हज़ारों आवाज़ें खुल जाती हैं।

लेकिन न जाने क्यों,

इतनी सारी आवाज़ों के बीच भी

एक अजीब-सी ख़ामोशी बची रहती है।


उस रेडियो में अब कुछ नहीं बजता।

फिर भी कई बार मैं उसके पास जाकर बैठ जाता हूँ।


शायद इसलिए कि कुछ वस्तुएँ

अपनी उपयोगिता खत्म होने के बाद

स्मृति का रूप ले लेती हैं।


मैंने एक बार उसे ठीक करवाने के बारे में सोचा था।

दुकान तक भी ले गया।

दुकानदार ने उसे उलट-पलट कर देखा

और बहुत साधारण ढंग से कहा

“अब इसके पुर्ज़े नहीं मिलते।”


उसकी बात सुनकर

मुझे जितना दुख रेडियो के लिए नहीं हुआ,

उससे ज़्यादा उस वाक्य के लिए हुआ।


अब इसके पुर्ज़े नहीं मिलते।


कितनी चीज़ों पर लागू होता है यह।

कुछ रिश्ते,

कुछ लोग,

कुछ पुराने विश्वास,

यहाँ तक कि मनुष्य का अपना एक रूप भी।


वे टूटते अचानक नहीं।

बस एक दिन पता चलता है

कि उन्हें पहले जैसा बनाने के लिए

ज़रूरी चीज़ें अब दुनिया में बची ही नहीं।


उस रात मैं रेडियो वापस कमरे में रख आया।

तब से वह वहीं है।


कभी-कभी देर रात

जब बाहर बहुत हल्की बारिश हो रही होती है,

मुझे भ्रम होता है

कि उसके भीतर से कोई पुराना गीत उठ रहा है।


बहुत धीमा।

लगभग हवा में घुला हुआ।


मैं ध्यान से सुनने की कोशिश करता हूँ,

लेकिन जैसे ही पास जाता हूँ,

आवाज़ गायब हो जाती है।


शायद कुछ चीज़ें सचमुच लौटकर नहीं आतीं।

वे सिर्फ़ स्मृति में

थोड़ी देर के लिए फिर से बज उठती हैं।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,,

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