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Tuesday, 19 May 2026

रात के लगभग तीन बजे

 रात के लगभग तीन बजे

अचानक
नींद खुली
तो लगा
कमरे में कोई और भी है।

अँधेरा
सामान्य से थोड़ा अधिक गहरा था,
जैसे उसने
किसी चीज़ को छुपा रखा हो।

मैं उठकर बैठ गया।

मेज़ पर रखा गिलास
आधा भरा था,
और उसके भीतर की स्थिरता में
कुछ ऐसा था
जो मुझे असहज कर रहा था।

दूर कहीं
रेल गुज़री।

उसकी आवाज़
धीरे-धीरे
दीवारों से टकराकर
कमरे में फैल गई,
जैसे किसी ने
बहुत पुरानी याद का दरवाज़ा खोल दिया हो।

मैंने सोचा
कितने लोग होंगे इस समय जागते हुए —
कोई अस्पताल में,
कोई स्टेशन पर,
कोई किसी के लौट आने की प्रतीक्षा में,
और कोई
सिर्फ़ इसलिए
कि नींद अब उससे प्रेम नहीं करती।

खिड़की के बाहर
एक पेड़ स्थिर खड़ा था।

इतना स्थिर
कि कुछ देर के लिए
मुझे वह पेड़ नहीं,
अँधेरे का विचार लगा।

सुबह होने से ठीक पहले
कमरे की चीज़ें
धीरे-धीरे
अपना आकार वापस पाने लगीं।

कुर्सी फिर कुर्सी बनी,
दीवार फिर दीवार,
और मैं
फिर वही आदमी
जो दिन भर
सामान्य दिखाई देता है।

— मुकेश

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