लोकपाल-सृष्टि और विराट पुरुष की अभिव्यक्ति
— ऐतरेयोपनिषद्
के प्रथम अध्याय, प्रथम खण्ड, तृतीय मन्त्र पर शंकरभाष्य का दार्शनिक विवेचन
मन्त्र
स
ईक्षतेमे नु लोका लोकपालान्नु सृजा इति।
सोऽद्भ्य एव पुरुषं समुद्धृत्यामूर्च्छयत्॥३॥
— ऐतरेय उपनिषद्
पदच्छेद
- सः ईक्षत
- इमे नु लोकाः
- लोकपालान् नु सृजा इति
- सः अद्भ्यः एव पुरुषम् समुद्धृत्य अमूर्च्छयत्
अन्वय
सः ईक्षत — “इमे लोकाः सन्ति;
एतेषां लोकानां लोकपालान् सृजामि” इति।
सः अद्भ्यः एव पुरुषं समुद्धृत्य
अमूर्च्छयत्।
शब्दार्थ
- ईक्षत — विचार किया, संकल्प किया
- लोकपालान् — लोकों के अधिष्ठाता एवं नियामक तत्त्व
- अद्भ्यः — जल से, आद्य तत्त्व से
- पुरुषम् — विराट चेतन पुरुष
- समुद्धृत्य — ऊपर उठाकर, प्रकट करके
- अमूर्च्छयत् — आकार दिया, अवयवयुक्त बनाया
भावार्थ
उस परमात्मा ने विचार किया
— “ये लोक तो उत्पन्न
हो गए; अब इनके
संचालन और संरक्षण के
लिए लोकपालों की रचना करूँ।”
तब उसने आद्य जलतत्त्व
से विराट पुरुष को प्रकट कर
उसे अंग-प्रत्यंगयुक्त रूप
प्रदान किया।
आदि
शंकराचार्य का भाष्य (मूल संस्कृत)
स
ईक्षत — इमे नु लोकाः सृष्टाः। लोकपालान् नु सृजा इति।
सोऽद्भ्य एव पुरुषं समुद्धृत्य अमूर्च्छयत्।
पुरुषाकारमपां पिण्डं कृत्वा अवयवविशिष्टं विराडात्मकं पुरुषम् अकरोत्।
शंकरभाष्य
का हिंदी अनुवाद
शंकराचार्य
कहते हैं कि परमात्मा
ने विचार किया — “ये लोक तो
उत्पन्न हो गए हैं;
अब इनके पालन और
संचालन हेतु लोकपालों की
रचना करनी चाहिए।”
तत्पश्चात्
उसने “अद्भ्यः” अर्थात् जलतत्त्व से पुरुष को
प्रकट किया। यहाँ “जल” केवल भौतिक
जल नहीं, बल्कि आद्य सृष्टि-सामग्री
या मूल संभाव्यता का
प्रतीक है। परमात्मा ने
उस जलतत्त्व से पुरुषाकार पिण्ड
को उठाकर उसे अंग-प्रत्यंगयुक्त
विराट पुरुष के रूप में
व्यवस्थित किया।
“अमूर्च्छयत्”
का अर्थ है — अव्यक्त
सत्ता को संगठित रूप
देना; चेतना के लिए एक
अनुभवयोग्य रूप की रचना
करना।
लोक
और लोकपाल की दार्शनिक अवधारणा
इस मन्त्र में “लोक” और
“लोकपाल” अत्यन्त महत्वपूर्ण दार्शनिक शब्द हैं।
“लोक”
का सामान्य अर्थ संसार या
जगत् है, किन्तु उपनिषदों
में लोक केवल भौतिक
स्थान नहीं, बल्कि अनुभव-क्षेत्र (fields of
experience) हैं। प्रत्येक लोक चेतना की
एक विशेष अवस्था या अस्तित्व-स्तर
का द्योतक है।
जब लोकों की रचना हो
जाती है, तब उनके
संतुलन, संचालन और व्यवस्था के
लिए “लोकपाल” आवश्यक होते हैं। अतः
लोकपाल केवल पौराणिक देवता
नहीं, बल्कि cosmic regulating
principles हैं — वे शक्तियाँ जो
ब्रह्माण्डीय व्यवस्था (ऋत) को सम्भव
बनाती हैं।
यहाँ
उपनिषद् एक अत्यन्त सूक्ष्म
सत्य व्यक्त करता है—
अस्तित्व
केवल पदार्थ से नहीं चलता;
उसके पीछे चेतन व्यवस्था
भी होती है।
“अद्भ्यः
एव पुरुषम्” — जल से पुरुषोत्पत्ति
वैदिक
साहित्य में “आपः” या
जल का अर्थ केवल
भौतिक जल नहीं होता।
वह—
- आद्य संभाव्यता,
- जीवन-बीज,
- सृजनात्मक ऊर्जा,
- अव्यक्त प्रकृति
का प्रतीक है।
इसलिए
“अद्भ्यः पुरुषम्” का अर्थ यह
नहीं कि कोई जैविक
शरीर जल से बना;
बल्कि यह कि विराट
चेतना ने अव्यक्त संभाव्यता
से व्यक्त रूप धारण किया।
विराट
पुरुष की अवधारणा
यह
“पुरुष” साधारण मनुष्य नहीं, बल्कि विराट चेतन सत्ता है।
यह वही दार्शनिक कल्पना
है जो पुरुषसूक्त में
“सहस्रशीर्षा पुरुषः” के रूप में
व्यक्त होती है।
विराट
पुरुष—
- सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का प्रतीकात्मक शरीर है,
- जिसमें सभी लोक, देवता, प्राणी और शक्तियाँ अन्तर्भूत हैं।
शंकराचार्य
“विराडात्मकं पुरुषम्” कहकर स्पष्ट करते
हैं कि यह समष्टि-चेतना का रूप है।
“अमूर्च्छयत्”
— चेतना का रूपग्रहण
“अमूर्च्छयत्”
शब्द अत्यन्त दार्शनिक है। इसका अर्थ
केवल “बनाया” नहीं है।
यह अव्यक्त चेतना के व्यक्त संरचना
ग्रहण करने की प्रक्रिया
को सूचित करता है।
अर्थात्—
- निराकार चेतना,
- अनुभव के लिए,
- रूप, संरचना और अवयव ग्रहण करती है।
इसे
आधुनिक भाषा में embodiment कहा
जा सकता है।
अद्वैत
वेदान्त की स्थापना
यहाँ
महत्वपूर्ण बात यह है
कि यह विराट पुरुष
आत्मा से पृथक् नहीं
है। अद्वैत वेदान्त के अनुसार—
- आत्मा ही जगत् के रूप में प्रकट होता है,
- वही विराट पुरुष बनता है,
- वही जीवों में चेतना रूप से विद्यमान रहता है।
अतः
सृष्टि आत्मा से अलग कोई
दूसरी सत्ता नहीं; वह आत्मा की
अभिव्यक्ति है।
Cosmology और
Cosmic Man Theory
विश्व
की अनेक परम्पराओं में
“Cosmic Man” की अवधारणा मिलती है। आधुनिक Comparative Mythology में इसे मानव-चेतना के सार्वभौमिक archetype के रूप
में देखा जाता है।
किन्तु
उपनिषद् की विशेषता यह
है कि यहाँ विराट
पुरुष केवल मिथकीय प्रतीक
नहीं, बल्कि चेतना और अस्तित्व की
अद्वैतात्मक व्याख्या है।
Phenomenology और
Embodiment
आधुनिक
Phenomenology शरीर को केवल जैविक
वस्तु नहीं, बल्कि चेतना की अभिव्यक्ति मानती
है।
Maurice Merleau-Ponty ने
“lived body” की अवधारणा प्रस्तुत की — शरीर चेतना
का अनुभवात्मक माध्यम है।
उपनिषद्
का “अमूर्च्छयत्” इसी ओर संकेत
करता है कि चेतना
स्वयं को अनुभव के
लिए रूप प्रदान करती
है।
Depth Psychology और
Archetype
Carl Gustav Jung के
अनुसार मानव-मन में
कुछ सार्वभौमिक archetypes उपस्थित रहते हैं। “Cosmic Man” या “Primordial Being” ऐसा ही
एक archetype है।
विराट
पुरुष की उपनिषदिक कल्पना
इस archetypal
consciousness की अत्यन्त उच्च दार्शनिक अभिव्यक्ति
मानी जा सकती है।
साधना
एवं आत्मचिन्तन
यह मन्त्र साधक को यह
अनुभव कराने का प्रयास करता
है कि शरीर केवल
जैविक संरचना नहीं, बल्कि चेतना का उपकरण है।
ध्यान
में साधक निम्न चिन्तन
कर सकता है—
“क्या
यह शरीर केवल पदार्थ
है?”
“क्या चेतना स्वयं को अनुभव हेतु
रूप प्रदान करती है?”
“क्या मेरा व्यक्तिगत अस्तित्व
विराट चेतना की अभिव्यक्ति है?”
यह चिन्तन व्यक्ति को देहाभिमान से
साक्षीभाव की ओर ले
जाता है।
निष्कर्ष
ऐतरेय
उपनिषद् का यह मन्त्र
लोक-सृष्टि के पश्चात् चेतना
के विराट पुरुष रूप में प्राकट्य
का दार्शनिक वर्णन करता है। लोकपाल
ब्रह्माण्डीय व्यवस्था के प्रतीक हैं,
और विराट पुरुष समष्टि-चेतना का रूप है।
शंकराचार्य इस मन्त्र द्वारा
यह स्थापित करते हैं कि
जगत्, लोक, देवता और
पुरुष — सब आत्मा की
ही विविध अभिव्यक्तियाँ हैं। इस प्रकार
उपनिषद् सृष्टि को जड़ पदार्थ
की प्रक्रिया नहीं, बल्कि चेतना की सृजनात्मक अभिव्यक्ति
के रूप में प्रस्तुत
करता है।
Mukesh,,,,,,,
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