होम | रोज़नामचा | कविताएँ | कहानियाँ | विचार | ज्योतिष | लेखक

Tuesday, 12 May 2026

उस घर की दीवारों पर धूप नहीं ठहरती

 

१.

उस घर की दीवारों पर धूप नहीं ठहरती

एक पुराने शहर का
पुराना ज़र्जर मकान है।

उसकी दीवारों पर
सीलन ऐसे उगी है
जैसे बरसों से
किसी ने रोशनी का नाम न लिया हो।

छज्जे टूटते रहते हैं धीरे-धीरे,
और हर बारिश में
घर थोड़ा और बूढ़ा हो जाता है।

उसमें एक बूढ़ा रहता है—
धीरे चलता हुआ,
खाँसता हुआ,
जैसे समय ने
उसकी पीठ पर अपना हाथ रख छोड़ा हो।

एक बुढ़िया भी है—
जिसकी आँखों में
अब आँसू नहीं आते,
सिर्फ़ पानी उतरता रहता है।

और एक लड़की है—
उम्र की उस दहलीज़ पर खड़ी
जहाँ औरतें
अपनी हँसी धीरे-धीरे भूलने लगती हैं।

सुबह वह स्कूल जाती है,
बच्चों को कविताएँ पढ़ाती है,
और लौटकर
चुपचाप आटा गूँधती है।

घर में एक कुत्ता भी है,
जो हर आने-जाने वाले को
उम्मीद की तरह देखता है।

एक बिल्ली आती है कभी-कभी—
चक्कर लगाती हुई,
मानो उसे मालूम हो
कि इस घर में
थोड़ा दूध नहीं,
थोड़ी तन्हाई बची है।

रात को
जब पूरा शहर सो जाता है,
तब उस घर की खिड़की में
बहुत देर तक
एक पीली-सी बत्ती जलती रहती है—

जैसे अँधेरे के ख़िलाफ़
किसी बूढ़े दिल की
आख़िरी गवाही।


२.

अनब्याही लड़की की अलमारी में कुछ सपने रखे हैं

उस लड़की की अलमारी में
दो-तीन साड़ियाँ हैं,
कुछ पुरानी किताबें,
एक टूटा हुआ कंघा,
और नीचे वाले खाने में
बहुत सावधानी से रखे हुए
कुछ सपने।

सपनों पर धूल जम चुकी है।

कभी-कभी वह
उन्हें निकालकर देखती है,
हल्के से मुस्कुराती है,
फिर वापस रख देती है—
जैसे कोई
पुराने ख़तों को छूकर
फिर तह लगा दे।

उसकी सहेलियों के बच्चे
अब बड़े हो रहे हैं।
किसी की बेटी कॉलेज में है,
किसी का बेटा नौकरी में।

और वह अब भी
हर महीने की पहली तारीख़ को
तनख़्वाह लाकर
बूढ़े के हाथ पर रख देती है।

बुढ़िया अक्सर कहती है—
“तेरी भी उम्र निकल रही है…”

लड़की मुस्कुरा देती है,
वैसी मुस्कान
जो सिर्फ़ दुखी लोग सीख पाते हैं।

रात को
जब सब सो जाते हैं,
वह छत पर जाकर
बहुत देर तक आसमान देखती रहती है।

शायद वह जानती है—
कुछ रिश्ते
ज़मीन पर नहीं उतरते,
सिर्फ़ तारों की तरह
दूर चमकते रहते हैं।


३.

बूढ़ा अपनी पेंशन से घर नहीं, समय चलाता है

हर महीने
एक तारीख़ आती है
जिस दिन बूढ़ा
अपनी पुरानी जैकेट पहनता है।

धीरे-धीरे चलता हुआ
पेंशन लेने जाता है।

उस दिन उसके चेहरे पर
थोड़ी रोशनी होती है—
जैसे कोई सैनिक
हार चुकी लड़ाई के बाद भी
सलाम ठीक से करना न भूला हो।

वह नोट गिनता नहीं,
सहलाता है।

उसे मालूम है
इन पैसों से
सिर्फ़ राशन नहीं आएगा—
इस घर की साँसें चलेंगी।

वापस आकर
वह दवाइयाँ अलग रखता है,
बिजली का बिल अलग,
और चुपके से
कुत्ते के लिए बिस्कुट भी।

उसकी अपनी इच्छाएँ
बहुत पहले मर चुकी हैं।

अब वह सिर्फ़
इस बात से डरता है
कि उसके बाद
इस घर का क्या होगा।

रात को
वह अक्सर जाग जाता है।

बहुत देर तक
छत को देखता रहता है—
मानो वहाँ
भगवान नहीं,
भविष्य लिखा हो।


४.

उस घर में उदासी भी एक सदस्य है

उस घर में
उदासी रहती नहीं,
बस गई है।

सुबह चाय के साथ बैठती है,
दोपहर में खामोश रहती है,
और रात को
सबके बिस्तरों तक चली आती है।

बुढ़िया कभी-कभी
पुराने बक्से खोलती है—
शादी की एक फीकी तस्वीर,
कुछ चिट्ठियाँ,
कुछ सूखे फूल।

फिर बिना कुछ बोले
ढक्कन बंद कर देती है।

कुत्ता बूढ़े के पैरों में सोता है।
बिल्ली खिड़की से झाँकती है।
और लड़की
रसोई में बर्तन धोते हुए
धीरे-धीरे कोई गीत गुनगुनाती है—

बहुत धीमे,
ताकि टूट न जाए।

उस घर में
कोई ज़ोर से नहीं बोलता।

जैसे सबको डर हो
कि ऊँची आवाज़ से
दीवारें गिर पड़ेंगी
या दिल।


५.

एक दिन वह मकान भी चला जाएगा

एक दिन
वह मकान गिर जाएगा शायद।

कोई बुलडोज़र आएगा,
धूल उड़ेगी,
ईंटें टूटेंगी,
और लोग कहते हुए निकल जाएँगे—
“बहुत पुराना घर था…”

मगर किसी को नहीं मालूम होगा
कि वहाँ
कितनी ज़िंदगियाँ धीरे-धीरे बुझी थीं।

कितनी रातें
बिना शिकायत गुज़री थीं।

कितने लोग
अपनी इच्छाओं को
चुपचाप तह करके
जीते रहे थे।

शायद तब तक
वह बूढ़ा न रहे,
बुढ़िया की खाँसी भी थम जाए,
और लड़की
बालों में सफ़ेदी छुपाना छोड़ दे।

पर उस घर की दीवारों में
जो आहें थीं,
वे शायद
मिट्टी में मिलकर भी
बाक़ी रहेंगी।

क्योंकि कुछ घर
ईंटों से नहीं बनते—
थोड़ी उम्मीद,
थोड़ी मजबूरी,
और बहुत सारी ख़ामोशी से बनते हैं।

No comments:

Post a Comment