होम | रोज़नामचा | कविताएँ | कहानियाँ | विचार | ज्योतिष | लेखक

Tuesday, 12 May 2026

तन्हाई भी एक रिश्ता बन जाती है

 तन्हाई भी एक रिश्ता बन जाती है

तेरे जाने के बाद
पहले-पहल
मुझे तन्हाई से बहुत ख़ौफ़ आता था।

कमरे की ख़ामोशी
ऐसे लगती थी
जैसे कोई वीरान मस्जिद
जहाँ सदियों से
कोई सज्दा न हुआ हो।

मैं देर तक
लोगों के बीच बैठा रहता,
बेमतलब बातें करता,
बाज़ारों की भीड़ में
अपने दिल का शोर दबाने की कोशिश करता।

मगर हर शोर के बाद
आख़िर में
मुझे उसी ख़ामोशी के पास लौटना पड़ता
जहाँ तेरी याद
मेरे इंतज़ार में बैठी होती।

अजीब बात है—
कुछ लोग चले जाते हैं,
मगर उनके जाने के बाद
घर का हर कोना
उनका लहजा बोलने लगता है।

यहाँ तक कि
दीवारों पर गिरती धूप भी
तेरा ज़िक्र करती थी।

मैंने कई रातें
तेरे नाम के साथ जागकर काटीं।
कभी दुआ की तरह,
कभी शिकवा बनकर,
कभी सिर्फ़ एक लंबी चुप्पी की तरह।

धीरे-धीरे
मैंने महसूस किया—
तन्हाई दुश्मन नहीं होती।

वह तो
रूह का वह आईना है
जिसमें आदमी
अपने सबसे सच्चे ज़ख़्म देखता है।

और शायद
सबसे सच्ची मोहब्बतें भी
भीड़ में नहीं,
इन्हीं ख़ामोश रातों में समझ आती हैं।

अब कभी-कभी
मैं अपनी तन्हाई के साथ
यूँ बैठता हूँ
जैसे किसी पुराने दोस्त के साथ।

हम दोनों
तेरा ज़िक्र नहीं करते,
मगर दोनों जानते हैं
कि बातचीत का विषय
अब भी तू ही है।

रात के आख़िरी हिस्से में
जब नींद
आँखों से बहुत दूर चली जाती है,
मैं खिड़की खोलकर
आसमान को देखता हूँ।

और दिल में
एक धीमी-सी रौशनी उतरती है—

कि कुछ लोग
हमारी ज़िंदगी में
साथ रहने के लिए नहीं आते,
बल्कि हमें
हमारी अपनी गहराई से मिलाने आते हैं।

— मुकेश

NEXT

“मोहब्बत कभी पूरी तरह ख़त्म नहीं होती”

बहुत अरसा हुआ
मैंने तेरे नाम को
ज़ोर से पुकारना छोड़ दिया है।

अब मैं
तेरा ज़िक्र भी
धीरे से करता हूँ,
जैसे कोई बुज़ुर्ग
पुरानी तस्बीह के दानों को
एहतियात से छूता है।

मगर सच यह है—
कुछ मोहब्बतें
आवाज़ खो देती हैं,
अस्तित्व नहीं।

वे भीतर
धीमे-धीमे जलती रहती हैं,
ठीक उस चिराग़ की तरह
जिसे कोई देख नहीं पाता
मगर जिसकी लौ
रूह को रोशन रखती है।

तेरे बाद
मैंने ज़िंदगी को
बहुत क़रीब से देखा।

लोग मिले,
रिश्ते बने,
कुछ चेहरे बहुत देर तक साथ भी रहे,
मगर दिल के एक हिस्से में
हमेशा एक ख़ाली मकान रहा
जिस पर सिर्फ़ तेरा नाम लिखा था।

कभी-कभी सोचता हूँ—
अगर तू लौट भी आए
तो क्या हम
वही लोग रह पाएँगे?

शायद नहीं।

वक़्त इंसान की आवाज़ ही नहीं,
उसकी रूह के मौसम भी बदल देता है।

मगर फिर भी
तेरी याद का असर
आज तक वैसा ही है।

आज भी
किसी उदास शाम में
जब हवा
हल्के से पर्दा हिलाती है,
मुझे लगता है
तू यहीं कहीं है—
बहुत पास,
मगर दिखाई नहीं देती।

मैंने अब
मोहब्बत से शिकायत करना छोड़ दिया है।

क्योंकि जो दर्द
रूह को गहरा कर दे,
वह बददुआ नहीं होता।

कुछ लोग
हमारी तक़दीर में
मिलने के लिए नहीं लिखे जाते,
वे सिर्फ़
हमें अधूरा छोड़कर
हमारी तलाश को मुकम्मल करने आते हैं।

और शायद
इसी का नाम इश्क़ है—

एक ऐसी रौशनी
जो बिछड़ने के बाद भी
दिल के किसी कोने में
उम्र भर जलती रहती है।

— मुकेश

No comments:

Post a Comment