एक आवाज़ थी
जिसे मैंने अपना समझ लिया था,
जैसे ख़ामोशी के बीच
कोई नाम पुकारता रहता है हमेशा।
उसकी लय में
मैंने अपनी धड़कनों को सजा लिया था,
उसके हर शब्द में
अपना ही सच सुनता था।
मगर आवाज़ों का भी मुक़द्दर होता है,
वे धीरे-धीरे दूर चली जाती हैं
जैसे शाम के बाद
पंछियों का लौटना भी थम जाता है।
अब वो आवाज़
किसी और के लिए होगी शायद,
या फिर कहीं
वक़्त की धूल में दब गई होगी।
बस इतना जानता हूँ,
सबसे मुश्किल है ‘कोई बात नहीं’ कहना
सबसे मुश्किल है
‘कोई बात नहीं’ कहना।
ये तीन शब्द
होठों पर आ तो जाते हैं,
पर भीतर
लहरों की तरह टूटते रहते हैं।
क्योंकि हर बार जब कुछ टूटता है,
तो हमें कहना पड़ता है
“कोई बात नहीं…”
जबकि सच ये होता है
कि बहुत कुछ बात होती है,
बहुत कुछ खोता है,
बहुत कुछ बिखरता है।
‘कोई बात नहीं’
दरअसल एक परदा है,
जिसके पीछे
हम अपनी ही आवाज़ों को
चुप कर देते हैं।
और फिर एक दिन
ख़ामोशी इतनी बढ़ जाती है
कि वही हमारी
इकलौती पहचान बन जाती है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,
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