वक़्त की धूल में कुछ ख़्वाब पुराने निकले,
हम जिसे भूल चुके थे वही फ़साने निकले।
रोज़ मिलता था वो चेहरे पे तबस्सुम लेकर,
दिल के अंदर मगर कितने वीराने निकले।
शहर भर ढूँढते फिरते रहे रिश्तों की महक,
घर में देखा तो कई ज़ख़्म सुहाने निकले।
धूप ने छाँव से पूछा कि सफ़र कैसा है,
दोनों चुप थे मगर दोनों सयाने निकले।
उम्र भर जिसको ख़ुद अपना समझते आए,
आईना टूटा तो कितने ही ज़माने निकले।
एक चिड़िया ने सुबह मुझसे ये आकर पूछा,
क्या सभी लोग यहाँ इतने थकाने निकले?
मैंने जब इश्क़ को चाहा तो ख़ुदा याद आया,
और जब ख़ुद को टटोला तो बहाने निकले।
रात भर चाँद मेरी छत पे टहलता ही रहा,
उसके दामन से कई ख़्वाब पुरानी निकले।
अब भी उम्मीद किसी मोड़ पे बैठी है 'मुकेश',
रास्ते भटके हुए हैं, न कि जाने निकले।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,
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