ईशावास्योपनिषद् का द्वादश मंत्र : सम्भूति–असम्भूति उपासना, अविद्या-निन्दा एवं शंकरभाष्य का दार्शनिक विवेचन
मूल मंत्र (यथावत)
अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽसम्भूतिमुपासते ।
ततो भूय इव ते तमो य उ सम्भूत्यां रताः ॥ १२ ॥
मंत्र का हिंदी अनुवाद
जो लोग असम्भूति (अव्यक्त प्रकृति/कारण रूप ब्रह्म या अविद्या) की उपासना करते हैं, वे अन्धकारमय अज्ञान में प्रवेश करते हैं। और जो लोग सम्भूति (कार्य ब्रह्म/हिरण्यगर्भ या सृष्ट रूप) में ही आसक्त रहते हैं, वे उससे भी अधिक घोर अन्धकार में जाते हैं।
शंकरभाष्य (संशोधित एवं यथावत संस्कृत रूप)
अधुना व्याकृताव्याकृतोपासनयोः समुच्चिचीषया प्रत्येकनिन्दोच्यते —
अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽसम्भूतिम् उपासते।
सम्भवनं सम्भूतिः, सा यस्य कार्यस्य सा सम्भूतिः। तस्या अन्याऽसम्भूतिः प्रकृतिः कारणम्, अविद्या अव्याकृता आख्या। ताम् असम्भूतिम् अव्याकृतां प्रकृतिं कारणरूपाम् अविद्यां कामकर्मबीजभूताम् अदर्शनात्मिकां उपासते ये, ते तत्स्वरूपमेव अन्धं तमः अदर्शनात्मकं प्रविशन्ति।
ततः तस्मादपि भूयः बहुतरमिव तमः प्रविशन्ति य उ सम्भूत्यां कार्यब्रह्मणि हिरण्यगर्भाख्ये रताः ॥ १२ ॥
शंकरभाष्य का हिंदी अनुवाद (यथारूप)
अब व्याकृत (कार्य) और अव्याकृत (कारण) की उपासना के समुच्चय की इच्छा रखने वालों के संदर्भ में प्रत्येक की निन्दा कही जाती है।
“अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽसम्भूतिमुपासते” —
जो लोग असम्भूति की उपासना करते हैं, वे अन्धकार में प्रवेश करते हैं।
“सम्भूति” का अर्थ है — उत्पत्ति या कार्य रूप अवस्था। जो कार्य रूप ब्रह्म है, उसे सम्भूति कहते हैं।
उसकी जो कारणरूप अवस्था है, वह असम्भूति कहलाती है, जिसे अव्याकृत प्रकृति या अविद्या कहा जाता है।
जो लोग उस असम्भूति अर्थात् अव्याकृत प्रकृति, जो काम और कर्म की बीजभूता है तथा अदर्शन स्वरूप है, उसकी उपासना करते हैं, वे उसी के अनुरूप अन्धकारमय अज्ञान में प्रवेश करते हैं।
और उससे भी अधिक घोर अन्धकार में वे लोग जाते हैं जो सम्भूति अर्थात् कार्यब्रह्म (हिरण्यगर्भ) में ही आसक्त रहते हैं।
शोधपूर्ण निबंध
“ईशावास्योपनिषद् के द्वादश मंत्र में सम्भूति-असम्भूति उपासना की निन्दा एवं शंकराचार्य की अद्वैत व्याख्या”
ईशावास्योपनिषद् का यह द्वादश मंत्र उपनिषद् दर्शन में एक अत्यन्त गूढ़ और सूक्ष्म आध्यात्मिक चेतावनी प्रस्तुत करता है। इसमें दो प्रकार की उपासनाओं — सम्भूति और असम्भूति — की आलोचना की गई है, जो साधक को अन्ततः अज्ञान के विभिन्न स्तरों में बाँध देती हैं।
आदि शंकराचार्य इस मंत्र की व्याख्या में यह स्पष्ट करते हैं कि यहाँ उपनिषद् किसी साधना का पूर्ण निषेध नहीं कर रहा, बल्कि सीमित उपासना के प्रति चेतावनी दे रहा है।
सम्भूति और असम्भूति का अर्थ
शंकराचार्य के अनुसार —
• सम्भूति = कार्य ब्रह्म (हिरण्यगर्भ, सृष्ट जगत का सूक्ष्म कारण)
• असम्भूति = अव्याकृत प्रकृति / कारण अवस्था / अविद्या
यह दोनों ही ब्रह्म के पूर्ण स्वरूप नहीं हैं, बल्कि सापेक्ष अवस्थाएँ हैं।
उपासना की सीमा
इस मंत्र का मुख्य संदेश यह है कि —
• केवल कारण (अव्यक्त) की उपासना
• या केवल कार्य (व्यक्त) की उपासना
दोनों ही सीमित हैं।
क्योंकि दोनों में ही द्वैत बना रहता है — उपासक और उपास्य का भेद।
“अन्धं तमः” का दार्शनिक अर्थ
यहाँ “अन्धकार” केवल अज्ञान नहीं, बल्कि सीमित दृष्टि का प्रतीक है।
• अव्याकृत उपासना → सूक्ष्म अज्ञान
• कार्य ब्रह्म उपासना → स्थूल अज्ञान
इस प्रकार दोनों ही आत्मज्ञान से दूर ले जाते हैं।
अद्वैत दृष्टि में इसका स्थान
अद्वैत वेदान्त के अनुसार —
• सम्भूति और असम्भूति दोनों ही “व्यवहारिक सत्य” हैं
• अंतिम सत्य = निरुपाधिक ब्रह्म
इसलिए केवल किसी एक रूप में आसक्ति, सत्य की पूर्णता से वंचित करती है।
शंकराचार्य की मुख्य व्याख्यात्मक दृष्टि
शंकराचार्य यहाँ एक अत्यन्त महत्वपूर्ण बात स्पष्ट करते हैं —
यह मंत्र किसी भी उपासना का निषेध नहीं करता, बल्कि “आसक्ति” का निषेध करता है।
अर्थात् समस्या उपासना नहीं, बल्कि सीमित उपासना को ही अंतिम सत्य मान लेना है।
आध्यात्मिक क्रम
इस मंत्र को यदि क्रमिक दृष्टि से देखें तो —
• अव्याकृत उपासना → सूक्ष्म स्तर
• कार्य उपासना → स्थूल स्तर
• आत्मज्ञान → अंतिम स्तर
इस प्रकार यह एक सीढ़ी है, जहाँ दोनों प्रारम्भिक चरण हैं, परन्तु अंतिम लक्ष्य नहीं।
ईशावास्योपनिषद् का द्वादश मंत्र साधक को यह सावधानी देता है कि किसी भी सीमित ब्रह्म-रूप में अटक जाना आध्यात्मिक अन्धकार का कारण बन सकता है।
आदि शंकराचार्य के अनुसार यह मंत्र अद्वैत दर्शन की उस मूल शिक्षा को पुष्ट करता है कि ब्रह्म न तो केवल कारण है, न केवल कार्य — बल्कि इन दोनों से परे शुद्ध, एक और निरुपाधिक सत्य है।
इस प्रकार यह मंत्र साधक को बाह्य उपासनाओं से आगे बढ़कर आत्मतत्त्व के समग्र और अद्वैत अनुभव की ओर प्रेरित करता है।
मुकेश ,,,,,,,,,,
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