अठारहवाँ तमाशा -अपने ही झूठों का तमाशा
मनुष्य
दूसरों से कम,
खुद से ज़्यादा झूठ बोलता है।
“मैं ठीक हूँ…”
उसका सबसे लोकप्रिय वाक्य है।
धीरे-धीरे
वह अपने ही बनाए हुए भ्रमों में
इतना रहने लगता है
कि सच
उसे असभ्य लगने लगता है।
और एक दिन
वह आईने में भी
अपना असली चेहरा नहीं पहचानता।
मुकेश ,,,,,,,,,,
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