तन्हा सा दिल अब थकन से भरा है,
राह को देखता हूँ तो अँधेरा घना है।
मेरे हर ख़्वाब पर धूल-सी जम गई है,
कोई अरमान भीतर ही भीतर मरा है।
तेरी यादों का मौसम ठहर-सा गया है,
जैसे वीरान जंगल में सन्नाटा धरा है।
मैंने हर मोड़ पर तुझको ढूँढा बहुत है,
पर हर इक रास्ता मुझसे जैसे खफ़ा है।
मेरे लफ़्ज़ों में दर्द की बूंदें हैं शामिल,
जैसे हर शेर आँखों से गिरता हुआ है।
ये जो चुप हूँ तो मतलब ये हरगिज़ नहीं है,
मेरे अंदर कोई शोर टूटा पड़ा है।
'मुकेश' इस दिल-ए-तन्हा का आलम न पूछो,
ये हँसता हुआ चेहरा अंदर से जला है।
मुकेश ,,,,,
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