शोकपत्र -
(एक धीमी दरार)
जैसे
अचानक किसी दिन
तुम्हारे भीतर की पूरी वास्तु-रचना बदल दी गई हो।
दरवाज़े वहीं हैं,
खिड़कियाँ भी,
मेज़, कुर्सियाँ, किताबें—
सब कुछ अपनी जगह मौजूद है,
लेकिन घर
अब घर नहीं रहा।
तुम्हें बताया जाता है
कि मनुष्य सहन कर लेता है।
वह जी लेता है।
वह आगे बढ़ता है।
लेकिन कोई यह नहीं बताता
कि “आगे” आख़िर कहाँ होता है।
तुम सुबह उठते हो
और पाते हो
कि रात अब भी तुम्हारे भीतर पड़ी हुई है।
तुम लोगों से मिलते हो,
सिर हिलाते हो,
ज़रूरी वाक्य बोलते हो,
यहाँ तक कि कभी-कभी हँस भी देते हो,
मगर भीतर
एक टूटी हुई नस
लगातार रिसती रहती है।
मृत्यु
सिर्फ़ किसी व्यक्ति को नहीं ले जाती,
वह तुम्हारे भीतर से
विश्वास का एक पूरा भूगोल उखाड़ ले जाती है।
अब तुम
पेड़ों को देखते हो
तो उनकी हरियाली पर भरोसा नहीं होता।
नदियों को देखते हो
तो उनका बहना
एक पुरानी आदत भर लगता है।
प्रार्थनाएँ
दीवार से टकराकर लौट आती हैं।
तुम सोचते हो
क्या स्मृति
दरअसल आत्मा का सबसे लंबा रोग है?
और फिर
धीरे-धीरे
तुम अपने ही जीवन में
एक दर्शक की तरह रहने लगते हो।
जैसे तुम्हारा शरीर
अब भी पृथ्वी पर मौजूद है,
लेकिन तुम्हारी चेतना
किसी निर्जन ग्रह पर छूट गई हो।
समय
तुम्हारा इलाज नहीं करता,
वह सिर्फ़
तुम्हारे घाव के चारों ओर
नई त्वचा उगा देता है।
घाव फिर भी वहीं रहता है—
गर्म, जीवित, धड़कता हुआ।
और एक दिन
तुम आईने में देखते हो
कि तुम्हारे चेहरे पर
उम्र नहीं,
अनुपस्थिति जमा हो गई है।
तब समझ आता है
कुछ लोग मरने के बाद
मिट्टी में नहीं मिलते,
वे
हमारे भीतर
धीरे-धीरे पत्थर बन जाते हैं।
मुकेश ,,
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