शहर की सबसे भीड़भरी सड़क पर
एक आदमी
बहुत धीरे-धीरे चल रहा था।
इतनी जल्दी में थीं सब आवाज़ें
कि किसी ने
उसकी ख़ामोशी पर ग़ौर नहीं किया।
दुकानों के शीशों में
रौशनियाँ काँप रही थीं,
मोबाइलों पर झुके चेहरे
अपनी-अपनी दुनियाओं में गुम थे।
वह आदमी
एक मोड़ पर जाकर रुका,
जेब से
मुड़ा हुआ काग़ज़ निकाला,
उसे देखा,
फिर बिना पढ़े वापस रख लिया।
ऐसा लगा
जैसे कोई पुराना ख़त हो
जिसका जवाब
अब इस दुनिया में कहीं नहीं बचा।
ऊपर
मेट्रो की आवाज़ गुज़री,
नीचे
ज़िंदगी उसी रफ़्तार से बहती रही।
और उस शोर के बीच
अचानक मुझे महसूस हुआ
इंसान सबसे ज़्यादा तन्हा
भीड़ में ही होता है,
जहाँ
किसी के रुक जाने से
कुछ भी नहीं रुकता।
मुकेश ,,,,,,,,
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