कुछ मकान
बंद होने के बाद भी
पूरी तरह ख़ाली नहीं होते।
उनकी दीवारों में
धीमे-धीमे चलती रहती हैं
पुरानी बातों की आहटें।
एक कमरे में
अब भी धूप उसी तरह गिरती है
जैसे कोई अभी-अभी
किताब बंद करके उठा हो।
मैं उस उजड़े हुए घर में
बहुत देर तक बैठा रहा।
खिड़की से आती हवा
बार-बार पर्दे हिलाती थी,
मानो कोई अदृश्य हाथ
अब भी वहाँ मौजूद हो।
मैंने चुपचाप
मेज़ पर उँगली फिराई
धूल जमी थी,
मगर उसके नीचे
किसी की मौजूदगी की गर्मी बची हुई थी।
तब समझ आया,
वक़्त
सिर्फ़ चीज़ों को पुराना नहीं करता,
कुछ रिश्तों को
इतना गहरा कर देता है
कि उनके चले जाने के बाद भी
जगहें उन्हें भूल नहीं पातीं।
मुकेश ,,,,,,,
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