अकेली महिला यात्री
वह अकेली यात्रा कर रही थी।
प्लेटफ़ॉर्म की भीड़ में
उसने अपने बैग का पट्टा
थोड़ा और कसकर पकड़ लिया था,
जैसे इस शहर में
सावधानी भी
एक अतिरिक्त सामान हो।
वह बार-बार
डिजिटल बोर्ड देखती,
फिर आसपास के चेहरों को
हर अनजान नज़र
उसे थोड़ी देर तक पीछा करती महसूस होती।
उसके पास
एक छोटा-सा सूटकेस था,
एक पानी की बोतल,
और आँखों में
थोड़ी थकान,
थोड़ी दृढ़ता।
रात की ट्रेन थी।
टी स्टॉल वाला
उसे “बहनजी” कहकर चाय देता है,
एक बूढ़ी औरत
बेंच पर थोड़ी जगह सरका देती है,
लेकिन फिर भी
पूरा प्लेटफ़ॉर्म
उसके लिए
पूरी तरह सुरक्षित नहीं हो पाता।
वह मोबाइल पर
धीरे-धीरे किसी से कहती है
“हाँ, ट्रेन आ जाए
तो बता दूँगी।”
उस एक वाक्य में
कितनी सदियों का डर छुपा था।
ट्रेन आने तक
वह लगातार सजग रही,
जैसे यात्रा नहीं,
एक परीक्षा दे रही हो।
मैंने देखा
पुरुषों के लिए
सफ़र अक्सर
सिर्फ़ दूरी तय करना होता है,
लेकिन एक अकेली स्त्री के लिए
कई बार
अपनी उपस्थिति बचाए रखना भी।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,
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