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Friday, 15 May 2026

प्लेटफ़ॉर्म : पाँचवीं नज़्म — एक बूढ़ा कुली

 

प्लेटफ़ॉर्म : पाँचवीं नज़्म — एक बूढ़ा कुली

वह बूढ़ा कुली
अब पहले जैसी तेज़ी से नहीं चलता था,
फिर भी
हर आती हुई ट्रेन के साथ
उसकी आँखों में
रोज़गार की एक छोटी-सी चमक उतर आती थी।

लाल कमीज़
कई जगह से फीकी पड़ चुकी थी,
पीतल का नंबर
धुँधला हो गया था,
और कंधों पर
बरसों का वजन
स्थायी दर्द की तरह बैठा था।

लेकिन वह अब भी
मुसाफ़िरों से कहता
“सामान उठा दूँ बाबू?”

जैसे यह सिर्फ़ काम नहीं,
उसकी पहचान हो।

उसने
न जाने कितने शहर
दूसरों के सूटकेसों में जाते देखे थे,
कितनी विदाइयाँ,
कितनी मुलाक़ातें,
कितने रोते बच्चे
और कितनी चुप औरतें।

प्लेटफ़ॉर्म का शायद ही कोई कोना हो
जहाँ उसकी थकान न पहुँची हो।

दोपहर में
जब स्टेशन थोड़ा सुस्त पड़ जाता,
वह बेंच पर बैठकर
अपने घुटनों को दबाता था
और दूर जाती पटरियों को
बहुत देर तक देखता रहता।

शायद
उसे भी कभी
कहीं जाना था,
लेकिन ज़िंदगी ने
उसे हमेशा
दूसरों का सामान ढोने में लगाए रखा।

एक दिन मैंने पूछा—
“बाबा, अब आराम क्यों नहीं कर लेते?”

वह हँसा,
वैसी हँसी
जिसमें खाँसी ज़्यादा थी।

फिर बोला
“बेटा,
कुछ लोग रोटी कमाते-कमाते
इतने बूढ़े हो जाते हैं
कि आराम भी उन्हें पहचानता नहीं।”

उसकी बात सुनकर
मुझे लगा
इस देश की आधी थकान
शायद ऐसे ही कंधों पर टिकी है,
जिन्हें इतिहास
कभी याद नहीं रखता।


मुकेश ,,,,,

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