प्लेटफ़ॉर्म : चौथी नज़्म — एक आवारा कुत्ता
प्लेटफ़ॉर्म का वह आवारा कुत्ता
शायद इस स्टेशन का
सबसे पुराना मुसाफ़िर था।
उसे
किसी ट्रेन का नंबर याद नहीं था,
न किसी शहर का नाम,
लेकिन वह पहचान लेता था
कौन आदमी
सचमुच उदास है।
वह कभी
चाय की दुकान के पास बैठता,
कभी बच्चों के पीछे-पीछे दौड़ता,
और कभी
रात की ठंडी बेंचों के नीचे
सिमटकर सो जाता।
कुली उसे
बासी रोटी डाल देते थे,
चायवाला
कभी-कभी बिस्कुट फेंक देता,
और टिकट चेकर
उसे देखकर
बस हल्का-सा मुस्कुरा देता था।
शायद
वह इस स्टेशन का
इकलौता जीव था
जिसे कहीं पहुँचना नहीं था।
लेकिन सबसे ज़्यादा
वह उन्हीं लोगों के पास जाकर बैठता
जो अकेले होते थे
घर छोड़कर जाते लड़के,
रोती हुई औरतें,
या देर रात तक
किसी का इंतज़ार करते बूढ़े लोग।
जैसे उसे मालूम हो
कि दुख की भी
एक अलग गंध होती है।
एक रात
बहुत तेज़ बारिश हुई,
ट्रेनें लेट थीं,
और पूरा प्लेटफ़ॉर्म
भीगती हुई बेचैनी से भरा था।
वह कुत्ता
चुपचाप
एक काँपते बच्चे के पास जाकर बैठ गया,
और बच्चा
अपना डर भूलकर
उसकी पीठ सहलाने लगा।
उस रात
मुझे पहली बार लगा
कभी-कभी
इंसानों से ज़्यादा
जानवर जानते हैं
साथ निभाने का अर्थ।
मुकेश ,,,,,,,,,
No comments:
Post a Comment