प्लेटफ़ॉर्म : तीसरी नज़्म
सुबह का प्लेटफ़ॉर्म
हमेशा उम्मीद की तरह खुलता है।
धुँध और धूप के बीच
पहली ट्रेन की सीटी
ऐसे सुनाई देती है
जैसे शहर
धीरे-धीरे अपनी आँखें खोल रहा हो।
चाय वाले की आवाज़
सबसे पहले जागती है
“चाय… गरम चाय…”
और उसके पीछे
पूरा स्टेशन
अपने पुराने रियाज़ की तरह
चलने लगता है।
अख़बार बाँटता लड़का
दौड़ते-दौड़ते
हर डिब्बे में
दुनिया की नई बेचैनियाँ फेंकता जाता है।
कुछ लोग
इंटरव्यू के लिए निकले हैं,
कुछ इलाज के लिए,
कुछ अपने गाँव लौट रहे हैं,
और कुछ
सिर्फ़ इस उम्मीद में सफ़र कर रहे हैं
कि शायद
दूसरा शहर
उन्हें थोड़ा कम उदास पाए।
एक जवान सैनिक
अपनी माँ के हाथ से
आख़िरी बार पराँठा खाता है,
एक लड़की
आईने की जगह
मोबाइल की काली स्क्रीन में
अपने बाल ठीक करती है,
और एक बूढ़ा आदमी
टिकट को बार-बार जेब में टटोलता है
जैसे यक़ीन कर रहा हो
कि सफ़र अब भी संभव है।
ट्रेन आती है
और हर चेहरा
कुछ देर के लिए
चलती हुई खिड़की बन जाता है।
मैंने देखा है
प्लेटफ़ॉर्म पर
विदाइयाँ कभी पूरी नहीं होतीं,
वे बस
अगली मुलाक़ात की संभावना में
रुक जाती हैं।
मुकेश ,,,,,,,,,
No comments:
Post a Comment