प्लेटफ़ॉर्म : दूसरी नज़्म
रात की आख़िरी ट्रेन के बाद
प्लेटफ़ॉर्म अचानक
बहुत बड़ा और बहुत अकेला लगने लगता है।
दिन भर की भीड़
अपने साथ
आवाज़ें भी ले जाती है,
बस कुछ चीज़ें रह जाती हैं
बिखरे अख़बार,
ठंडी पड़ चुकी चाय,
और बेंचों पर बैठी हुई
थकान।
सफ़ाई करने वाला आदमी
धीरे-धीरे झाड़ू लगाता है
जैसे पूरे दिन की कहानियों को
एक कोने में समेट रहा हो।
डिजिटल घड़ी की लाल रोशनी
बार-बार चमकती है,
और पटरियाँ
दूर अँधेरे में जाकर
ऐसे गुम हो जाती हैं
जैसे किसी अधूरी दास्तान का अंत।
एक आवारा कुत्ता
स्टेशन मास्टर के कमरे के बाहर
गोल होकर सो गया है,
उसे शायद
किसी ट्रेन का इंतज़ार नहीं।
लेकिन कुछ लोग
अब भी जाग रहे हैं
वो जिनके शहर दूर हैं,
या जिनकी ज़िंदगी में
कोई घर नहीं बचा।
रात के इस सन्नाटे में
प्लेटफ़ॉर्म
मुझे हमेशा
एक बूढ़े दरवेश जैसा लगता है,
जो दिन भर
हज़ारों कदमों की आहट सुनता है
और फिर भी
किसी को रोकता नहीं।
मुकेश ,,,,,,,,,,,
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