घड़ी के बिना समय का आदमी —
वह आदमी था, पर उसके आसपास समय धीरे-धीरे अपनी घड़ी खोने लगा था।
पहले घड़ी बंद हुई, फिर दूसरी, फिर घर के भीतर टिक-टिक करना भी एक भूल की तरह रह गया।
लोगों ने कहा — “समय रुक गया है।”
पर वह रुका नहीं था, वह बिखर गया था।
वह आदमी हर दिन एक ही जगह बैठता था, पर यह कहना कठिन था कि वह वही दिन था या हर दिन एक-दूसरे में घुल गए थे।
कभी वह उठता, और लगता जैसे उठना किसी पुराने सपने की पुनरावृत्ति हो।
कभी वह बैठा रहता, और बैठना भी किसी और की स्मृति जैसा प्रतीत होता।
धीरे-धीरे उसके भीतर समय का सीधा प्रवाह टूटने लगा।
अब अतीत पीछे नहीं था, भविष्य आगे नहीं था
दोनों कहीं आसपास थे, पर पहचान में नहीं आते थे।
एक दिन उसने देखा कि उसके हाथों में उम्र दिखाई देने लगी है,
लेकिन वह तय नहीं कर पा रहा था कि यह उम्र बढ़ रही है या वापस लौट रही है।
उसकी आँखों में दृश्य नहीं थे — केवल अंतराल थे।
जहाँ चीज़ें घटती थीं, पर पूरी नहीं होती थीं।
अब वह आदमी समय में नहीं रहता था।
वह समय के उन टुकड़ों में रहता था जो किसी घटना से छूट गए हों।
कभी-कभी कोई उसे देखता है तो लगता है
वह अभी आया है।
और अगले ही पल यह भी लगता है
वह हमेशा से वहीं था।
अब वह न अतीत में है, न भविष्य में।
वह उस जगह है जहाँ समय अपने अर्थ से थोड़ा थककर बैठ जाता है।
मुकेश ,,,,,,,,
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