दरवाज़ों के बिना घर का आदमी —
वह आदमी था, पर उसका घर धीरे-धीरे दरवाज़े खोने लगा था।
शुरुआत में एक दरवाज़ा गायब हुआ — किसी ने ध्यान नहीं दिया। फिर दूसरा, फिर तीसरा… और एक दिन घर पूरा का पूरा बिना दरवाज़ों के रह गया।
लोग कहते थे, “अब यह घर खुला है।”
पर अजीब बात यह थी कि अब कोई भीतर भी नहीं जा सकता था।
वह आदमी उसी घर में रहता था।
शुरुआत में वह बाहर जाता था और लौट आता था। फिर लौटना कम हो गया। फिर बाहर जाना भी। अंत में यह तय करना मुश्किल हो गया कि वह बाहर है या भीतर।
कमरों की सीमाएँ धीरे-धीरे धुंधली होने लगीं।
दीवारें अब केवल दीवारें नहीं थीं — वे किसी याद की तरह थीं, जो कभी स्पष्ट थी और अब सिर्फ़ महसूस होती थी।
एक दिन उसने पाया कि वह किसी दरवाज़े को खोलने की कोशिश कर रहा है,
पर उसके हाथों में दरवाज़े का विचार था, दरवाज़ा नहीं।
उस दिन उसे पहली बार लगा कि घर बदल रहा है।
लेकिन घर नहीं बदल रहा था — वह खुद बदल रहा था।
धीरे-धीरे वह आदमी अपने घर की तरह हो गया
जिसमें प्रवेश और निकास का फर्क मिट चुका था।
अब वह किसी जगह नहीं रहता था।
वह उन खाली रास्तों में रहता था जहाँ से लोग गुजरते हैं, लेकिन रुकते नहीं।
कभी-कभी कोई सोचता है कि उसने उसे देखा है
किसी दीवार के पास, किसी कोने में, किसी अधूरी रोशनी में।
पर जब देखने वाला थोड़ा करीब जाता है,
तो वह आदमी पहले से ही किसी और जगह हो चुका होता है
या शायद जगह ही उसका रूप ले चुकी होती है।
मुकेश ,,,,
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