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Wednesday, 20 May 2026

छाया में बदलता आदमी

 

छाया में बदलता आदमी 

वह आदमी था, पर उसकी उपस्थिति हमेशा थोड़ी देर बाद समझ में आती थी।
पहले वह चलता था, फिर धीरे-धीरे उसका चलना कम हो गया — और उसका होना बढ़ने लगा।

शुरुआत में लोग उसे देखते थे।
फिर देखते हुए भी अनदेखा करने लगे।
और एक दिन, उसने खुद भी अपने देखने पर संदेह करना शुरू कर दिया।

धीरे-धीरे उसके भीतर से आवाज़ कम होने लगी।
कदमों की जगह अब केवल हल्का-सा कंपन रह गया था, जैसे कोई चीज़ चल नहीं रही, बस मौजूद हो रही हो।

फिर वह बदलने लगा।

पहले वह शरीर था, फिर स्मृति, और धीरे-धीरे एक ऐसी उपस्थिति जिसमें आकार का अर्थ कम हो गया।
वह दीवारों के पास खड़ा रहता, लेकिन दीवारें उसे पूरी तरह नहीं पहचानती थीं।
वह रोशनी में होता, पर रोशनी उसे पूरा नहीं पकड़ती थी।

एक दिन उसने देखा कि उसकी छाया उससे थोड़ी पहले चलने लगी है।

पहले यह अजीब लगा, फिर सामान्य हो गया।
धीरे-धीरे छाया और आदमी के बीच फर्क मिटने लगा।

अब स्थिति यह थी कि
कभी आदमी छाया बन जाता था,
और कभी छाया आदमी का काम कर रही होती थी।

लोगों को समझ में नहीं आता था कि वे किसे देख रहे हैं 
क्योंकि दोनों में से कोई भी पूरी तरह उपस्थित नहीं था।

वह अब किसी जगह नहीं रहता था।
वह जगहों के बीच की वह हल्की-सी दरार बन गया था जहाँ से चीज़ें गुजरती हैं और थोड़ी बदल जाती हैं।

और अंत में
न आदमी बचा,
न छाया पूरी रही।

सिर्फ़ एक हल्का-सा अंधेरा रह गया,
जो कभी-कभी अपने आप चल देता है 
और किसी को पता नहीं चलता कि वह आया कहाँ से था।

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