बर्फ़ से बहता हुआ आदमी —
वह आदमी था, पर उसका होना बहुत ठोस नहीं था।
दिनों के साथ वह धीरे-धीरे भीतर से ठंडा होने लगा। बाहर जीवन चलता रहा, भीतर तापमान गिरता रहा।
पहले उसने कम बोलना शुरू किया, फिर महसूस करना भी जैसे कम हो गया। लोग कहते — “थोड़ा शांत हो गया है।” पर वह शांत नहीं हुआ था, वह जम रहा था।
समय उसके पास आता, टकराता, और लौट जाता। उसके भीतर कुछ भी पकड़ में नहीं आता था, जैसे वह धीरे-धीरे किसी पदार्थ से बदलकर अवस्था में बदल रहा हो।
फिर वह पूरी तरह बर्फ़ हो गया — चलता हुआ शरीर, पर भीतर स्थिर। भावनाएँ जमी हुई, विचार जमे हुए, और स्मृति भी जैसे एक पारदर्शी पत्थर में बदल गई हो।
एक दिन दरार आई।
बहुत छोटी, लगभग अदृश्य।
न कोई घटना हुई, न कोई घोषणा। पर उसी दरार से वह पिघलने लगा।
पहले भीतर का कठोरपन टूटा, फिर जमी हुई चुप्पियाँ पानी में बदलने लगीं। वह अब वही आदमी नहीं था जो पहले जम गया था — और न ही अभी पूरा कुछ बन पाया था।
वह बहने लगा।
कभी वह किसी कमरे के कोने से गुजरता, और वहाँ कुछ देर तक भारीपन छोड़ देता। कभी किसी चेहरे के पास रुकता, और वहाँ हल्की नमी बच जाती।
अब वह किसी दिशा में नहीं जाता। वह केवल फैलता है, सीमाओं को छूता है और पीछे छोड़ देता है।
जो लोग उसे देखते हैं, वे कहते हैं —
“यह आदमी नहीं है।”
पर सच यह है —
अब वह आदमी और अवस्था के बीच कहीं बह रहा है।
न पूरी तरह बर्फ़,
न पूरी तरह पानी।
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