एक बंद दरवाज़े की साँस
घर में एक दरवाज़ा था, जो खुलता नहीं था।
न इसलिए कि वह बंद था — बल्कि इसलिए कि उसे खोलने की आदत धीरे-धीरे खत्म हो गई थी।
शुरुआत में लोग कहते थे, “यह इस्तेमाल नहीं होता।”
फिर समय ने इसे बदलकर “यह शायद अब जरूरी नहीं” कर दिया।
और एक दिन, किसी ने उसका नाम लेना भी छोड़ दिया।
फिर भी, दरवाज़ा था।
कभी-कभी रात के आख़िरी हिस्से में, जब घर अपनी सबसे धीमी आवाज़ में सांस लेता है,
तो ऐसा लगता है जैसे उस दरवाज़े के भीतर से कोई हल्की-सी हरकत आती है
जैसे कोई याद अपने भीतर करवट बदल रही हो।
दीवारें उसे घेरती नहीं थीं, बस उसके होने को सहती थीं।
और दरवाज़ा भी किसी पर खुलना नहीं चाहता था
वह बस अपनी उपस्थिति बनाए रखना चाहता था, बिना प्रवेश और निकास के अर्थ के।
एक दिन किसी ने कहा कि इसे तोड़ देना चाहिए।
पर हथौड़ा उठाने से पहले ही आवाज़ रुक गई।
क्योंकि कभी-कभी चीज़ें टूटती नहीं हैं
वे सिर्फ़ सुनी जाना बंद हो जाती हैं।
अब वह दरवाज़ा वहाँ है,
जहाँ कोई नहीं जाता।
लेकिन अजीब बात यह है
जब भी घर में कोई बहुत देर तक चुप रहता है,
तो लगता है जैसे उस दरवाज़े के दूसरी तरफ़
कोई उस चुप्पी को सुन रहा है।
और शायद यही उसका काम है
खुलना नहीं,
सिर्फ़ यह याद दिलाना कि हर बंद चीज़ समाप्त नहीं होती।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,
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